भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 642
७०गौतमस्मृतिः ॥

सत्यं,यशः, श्रीरूपं गोरोजस्तेजः पुरुषो धर्म्मः शिवशिव इत्ये- तैर्ग्रासानुमन्त्रणं प्रतिमन्त्रं मनसा नमः स्वाहेति वा, सर्वं ग्रासप्रमाणमास्याविकारेण चरुभैक्षसक्तुकणयावकपयोदधि- घृतमूलफलोदकानि हवींष्युत्तरोत्तरं प्रशस्तानि पौर्णमास्यां पञ्चदश ग्रासान् भुक्तवैकापचयेनापरपक्षमश्नीयादमावास्या- यामुपोष्यैकोपचयेन पूर्वपक्षं विपरीतमेकेषाम् ॥ १ ॥ एष चान्द्रायणो मासो मासमेकमाप्त्वा विपापो विपाप्मा सर्वमे- नो हन्ति द्वितीयमाप्त्वा दशपूर्वान्दशावरानात्मानं वैकविंशं


वस्तु को देखते हुए मन्त्र पढ़ना) और उपस्थान करे। तदनन्तर (यद्देवादेव० यजु० अ० २० । १४—१९) इन चार मन्त्रोंसे घी का होम करके (देवकृतस्यै-नसो० यजु० अ० ८ । १३) के छः मन्त्रों द्वारा समिधाओं का होम करके (ओं भूः०) इत्यादि प्रकार—भूः, भुवः, स्वः, तपः, सत्यम्, यशः, श्रीः, रूपम्, गौः, ओजः, तेजः, पुरुषः, धर्मः, शिवः, शिवः, इन प्रत्येक के साथ ओं लगा-कर एक २ को पढ़ २ क्रम से १५ ग्रासों को देखे। और प्रत्येक ग्रास को खाते समय (नमः स्वाहा) ऐसा मन से कहता जावे। जिस में मुख की स्वाभाविक दशा में विकार न हो (अधिक फैलाने न पड़े) वही एक ग्रास का प्रमाण जानो। चरु, (भात) भिक्षा का अन्न, जौ का सत्तू, कण, कुलत्थ, गौ के दूध, दही, घी, मूल, फल, जल, ये सब व्रत में खाने योग्य हविष्यान्न हैं। इन में अगला २ श्रेष्ठ है। पौर्णमासी को पन्द्रह ग्रास खाकर आगे कृष्णपक्ष की प्र-त्येक प्रतिपदादि तिथियों में एक २ ग्रास घटाता जावे। प्रतिपदा को १४ द्वितीया को १३ इत्यादि प्रकार, चतुर्दशी को एक ग्रास खाकर अमावास्या को निराहार उपवास करे। फिर शुक्ल प्रतिपदा से एक २ ग्रास बढ़ाता जाय पौर्णमासी को फिर १५ ग्रास खावे (यही पिपीलिका मध्य चान्द्रायण व्रत कहाता है) किन्हीं ऋषियों का मत है कि कृष्णपक्ष में एक २ ग्रास बढ़ाकर, शुक्ल पक्ष में घटावे (यही यवमध्य चान्द्रायण व्रत है) ॥ १ ॥ यह चान्द्रा-यण एक मासका कहाता है। एक मास व्रत करके पापों से मुक्त होकर सब मलिनता वा अपराधों को नष्ट करता, द्वितीय चान्द्रायण व्रत करके अपने कुल की दश पिछली दश अगली और इक्कीसवें अपने को तथा जिस पङ्क्ति