अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ५३
धिषूदिधिषूपतिस्त्रीग्रामयाजकाजपालोत्सृष्टाग्निमद्यपकुचर- कूटसाक्षिप्रातिहारिकानूपपतिर्यस्य च कुण्डाशी सोमविक्रय्य- गारदाही गरदावकीर्णिगणप्रेष्योऽगम्यागोमिहिंस्रपरिवित्ति- परिवेत्तृपर्याहृतपर्याधातृत्यक्तात्मदुर्बलाः कुनखिश्यावदन्त- श्वित्रिपौनर्भवकितवाजपराजप्रेष्यप्रतिरूपकशूद्रपतिनिरा- कृतिकिलासिकुसीदिवणिक्शिल्पोपजीविज्यावादित्रतालवृ- त्यगीतशीलान् पित्राचाकामेन विभक्तान् शिष्यांश्र्चैके सगोत्रांश्च ॥२॥
हत्या करनेवाला, जिसके मौजूद होते ही स्त्री ने अन्य पुरुष करलिया हो, वा जिसने अन्य की विवाहिता स्त्री को रखलिया हो, स्त्री को और गांवभर के मनुष्यों को एक साथ यज्ञ करानेवाला, भेड़ बकरी पालनेवाला, जिसने स्थापन किये अग्नि को त्यागा हो, मद्य पीनेवाला, जिसका चाल चलन अच्छा न हो, झूठ गवाही देनेवाला, जिसकी स्त्री का दूसरा जार पति हो, कूंडे में भोजन करने-वाला, यज्ञ में सोम बेचने वाला, घर में आग लगाने वाला, विष देनेवाला, ब्रह्मचारी होकर जो व्यभिचार करे, सभा का नौकर, अगम्या स्त्री से गमन कर-नेवाला, हिंसक, ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र लेवे वह, और उसका जेठा भाई, जो सब ऊंच नीचों से सब प्रकार का दान लेवे, जो सब वेश्यादि नीच स्त्रियों से भी व्यभिचार करे, जिसने अपने शरणा-गतों वा दुर्बल अनाथ पुत्रादि को त्यागा हो, जिसके नख बिगड़े हों, दांत काले हों, श्वेतकुष्ठी, जो अन्य की स्त्री में पैदा हुआ हो, ज्वारी, बकरियों का पालने वाला, राजा का नौकर, बहुरूपिया, शूद्रा स्त्री का पति, जिसका अनादर खण्डन होता हो, किलासि (एक प्रकार का कुष्ठी,) सूद लेनेवाला, पंसारी आदि की दुकान करने वाला, कारीगर, धनुषबाण चलाने-वाजे ताल बजाने-नाचने और गाने के स्वभाववाला, पिता की आज्ञा वा इच्छा के बिना जिसने विभाग (बांट) किया हो ऐसे उक्तप्रकार के चोरी आदि काम करने वाले ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन न करावे। और कोई आचार्य कहते हैं कि अपने गोत्र के लोगों और अपने शिष्यों को भी श्राद्ध में भोजन न करावे ॥२॥