भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ १९

पूर्वःपूर्वो गुरुस्तदलाभे क्षत्रवृत्तिस्तदलाभे वैश्यवृत्तिः॥१॥तस्या पण्यं गन्धरसकृतान्नतिलशाणक्षौमाजिनानि, रक्तनिर्णिते वाससी क्षीरं च सविकारं मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणोद- कापथ्यानि पशवश्च हिंसासंयोगे पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यं भूमिब्रीहियवाजाव्यृषभधेन्वनडुहश्चैके ॥ २ ॥ वि- निमयस्तु रसानां रसैः पशूनां च न लवणाकृतान्नयोस्तिला- नां च समेनासमेन तु पक्वस्य संप्रत्यर्थे सर्वधातुवृत्तिरशक्ता- वशूद्रेण तदप्येके प्राणसंशये तद्वर्णसंकराद्भक्ष्यनियमस्तु प्रा-


यज्ञ कराना, वेदादि पढ़ाना, और दान लेना ये काम ब्राह्मण गुरु के ही हैं । और नीचे २ वर्षों का अपने से ऊंचा २ गुरु भी हो सकता है । जैसे क्षत्रिय का ब्राह्मण, वैश्य का गुरु क्षत्रिय, और शूद्र का गुरु वैश्य होसकता है । वैसे शुद्ध ब्राह्मण के न मिलने पर क्षत्रिय के कर्म करने वाले ब्राह्मण को वा वैश्यवृत्ति करने वाले ब्राह्मण को क्षत्रियादि गुरु करें ॥१॥ यदि ब्राह्मणको आपत्काल में वैश्य के कामों से जीविका करने पड़े तो, केशर चन्दन हींगादि गन्ध द्रव्य, दूध, लवणादि रस, पूरी मिठाई आदि पकाया भोजन, तिल, शण वा शण के कपड़े, अतीस के (मुकटादि) वस्त्र, मृगचर्म, रंगे और धोये वस्त्र, दूध, दही, रबड़ी, पेड़ा, खोयादि, मूल, फल, पुष्प, औषध, महत, मांस, फूस (पूरा) जल, कुपथ्यकारक वस्तु, जो कसाई के घर जाने सम्भव हों ऐसे पशु, पुरुष, बंध्या गौ वा भैंसी आदि, कुमारी कन्या, गर्भपातिनी गौ आदि, इन सब को कभी भी न बेंचे। पृथिवी, धान, जौ, भेड़, बकरी, ऋषभ— (नये बछड़ा, खैला), काम में चले हुए बैल, इन सबको भी न बेंचे यह किन्हीं आचार्यों का मत है ॥२॥ रसों का रसों के साथ और पशुओं का पशुओं के साथ बदना भले ही कर लेवे । परन्तु कच्चे अन्न और लवण का तथा परस्पर तिलों का बदलना न करे। तौल में अधिक कम का बदला करना हो तो कच्चे अन्न के साथ पकाये अन्न का बदला कर लिया करे । और जिस कालमें धनके विना तंग असमर्थ हो तब लोहा तांबा पीतल कांसादि सब धातुओं के लेन देन द्वारा जीविका कर लेवे । पर शूद्रके साथ जीविका न करे । और कोई आचार्य कहते हैं कि प्राण जाने का भय हो तो शूद्र से भी जीविका कर लेवे । परन्तु उन नीच वर्णसंकरों के घर के पकाये अभक्ष्य अन्न को न खाने का