भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२० Gautam Smriti page header:

२० गौतमस्मृतिः ॥

णसंशये ब्राह्मणोऽपि शस्त्रमाददीत राजन्यो वैश्यकर्म वैश्यकर्म ॥ ३ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ द्वौ लोके धृतव्रतौ राजा ब्राह्मणश्च बहुश्रुतस्तयोश्चतुर्विधस्य मनुष्यजातस्यान्तःसंज्ञानां चलनपतनसर्पणानामायत्तं जीवनं प्रसूतिरक्षणमसंकरो धर्मः ॥ १ ॥ सएष बहुश्रुतो भवति लोकवेदवेदाङ्गविद् वाकोवाक्येतिहासपुराणकुशलस्तदपेक्षस्तद्वृत्तिश्चत्वारिंशता संस्कारैः संस्कृतस्त्रिषु कर्मस्वभिरतः षट्सु वा समयाचारिकेष्वभिविनीतः षड्भिः परिहा-


नियम तब भी रक्खे । और प्राण जाने का भय हो तो ब्राह्मण भी शस्त्र (हथियारों) का ग्रहण करे । और प्राण संकट के आपत्काल में राजकुल का क्षत्रिय भी वैश्य के कर्मों द्वारा निर्वाह करना स्वीकार करे ॥ ३ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ संसार में एक राजा द्वितीय बहुत पढ़ा लिखा वेद शास्त्रवेत्ता विद्वान् ये दोनों ठीक२ अपने नियमों पर दृढ़ होने चाहिये । इन्हीं दोनों पर सब मनुष्यों और पश्वादि प्राणीमात्र का चलना फिरना चेष्टा करना आदि रूप जीवन का निर्वाह निर्भर है । तथा जीवों की उत्पत्ति, रक्षा और धर्म में चपला न होना भी राजा और विद्वान् ब्राह्मण पर ही निर्भर है ॥१॥ बहुश्रुत ब्राह्मण वह कहलाता है कि जो लोकव्यवहार में चतुर, वेद-वेदाङ्गों का जाननेवाला, वाकोवाक्य (प्रश्नोत्तर रूप वैदिक ग्रन्थ) इतिहास, पुराण, इन सब में कुशल—अच्छा जानकार हो, इन्ही वेदादि की अपेक्षा रक्खे, और इन्ही के द्वारा जिसकी जीविका हो, जिसकी आगे कहे चालीस संस्कारों से शुद्धि हुई हो । वेद का पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान देना इन तीन कर्मों में वा वेदाध्यन, यज्ञ करना और दान लेना इनके सहित छः कर्मों में जो तत्पर हो, समयानुकूल आचार विचारों में जो सर्वथा विनय के साथ बर्ताव कर्त्ता हो, विद्वान् ब्राह्मण अपने छः कर्मों में तत्पर न हो तो राजा उसका निरादर करे वा अधिक अधर्मी हो तो वध करा देवे । और यदि अपने वेदोक्त कर्मों में तत्पर रहता हो तो मार डालने

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