अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ | गौतमस्मृतिः ॥
आचार्यज्ञातिगुरुष्वेव्वलाभेडन्यत्र॥१७॥ तेषां पूर्वं पूर्वं परिह- रन्निवेद्य गुरवेऽनुज्ञातो भुञ्जीत ॥ १८ ॥ असंनिधौ तद्भार्या- पुत्रसब्रह्मचारिसद्भ्यः ॥ १९ ॥ वाग्यतस्तृप्यन्नलोलुप्यमान- स्सन्निधायोदकं स्पृशेत् ॥ २० ॥ शिष्यशिष्टिरवधेनाशक्तौ रज्जुवेणुविदलाभ्यां तनुभ्यामन्येन घ्नन् राज्ञा शास्यः ॥२१॥ द्वादशवर्षाण्येकैकवेदे ब्रह्मचर्य्यं चरेत् प्रतिद्वादशसु सर्वेषु ग्रहणान्तं वा ॥२२॥ विद्यान्ते गुरुमर्थेन निमन्त्र्यः ॥२३॥ ततः कृतानुज्ञातस्य स्नानम् ॥ २४ ॥ आचार्यः श्रेष्ठो गुरूणां मा- तेत्येके ॥ २५ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
यदि आचार्य, अपने कुटुम्बी और जगत् में विशेष मान्य गुरु लोग इन से अन्यत्र निर्वाह योग्य भिक्षा मिल जाय तो इनके घरों से न मांगे ॥ १७ ॥ यदि अन्यत्र भिक्षा न मिले तो भी आचार्यादि पहिले २ को छोड़के अगले २ के घर से मांगे, फिर भिक्षा के अन्न का गुरु के समीप निवेदन कर उन की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१८॥ यदि गुरू जी कहीं गये हों, समीपमें न हों तो गुरुपत्नी, गुरुपुत्र, संग पढ़नेवाले ब्रह्मचारी, और कोई सज्जन पुरुष इनके समीप निवेदन करके भोग लगावे ॥ १९ ॥ प्रथम भोजन को समीप रख कर जल से आचमन करे तब मौन हो कर चंचलता को छोड़ के तृप्त होता हुआ भोजन करे ॥२०॥ गुरु शिष्यको ऐसी ताड़ना करे जिससे वध (हिंसा) नहो, और गुरु अशक्त असमर्थ बीमार होतो छोटे २ रस्सी, बेंत, बांस, से धीरे २ शिक्षा करें जिससे अधिक चोट न लगे। यदि अन्य बड़े कठोर दण्ड से मारे तो राजा गुरुको दण्ड देवे ॥२१॥ एक २ वेदके पढ़नेमें बारह २ वर्ष ब्रह्मचर्य धारण करें। अथवा प्रत्येक बारह वर्ष में जब तक एक २ वेद को पढ़ सके तब तक ब्रह्मचारी रहे ॥ २२ ॥ और विद्या पढ़ने की समाप्ति में धनादि देने के लिये गुरू से प्रार्थना करे कि भगवन् ! आज्ञा कीजिये क्या दक्षिणा उपस्थित करूं ॥२३॥ तदनन्तर गुरुकी आज्ञासे ही गृहस्थाश्रम के लिये समावर्त्तन स्नान करे ॥२४॥ सम्पूर्ण गुरुओं में आचार्य (उपनयन कराके साङ्ग वेद पढ़ाने वाला गुरु) श्रेष्ठ हे और कोई महर्षि लोग माता को श्रेष्ठ कहते मानते हैं ॥ २५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीय अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥