अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९
अर्च्चिते श्रेयसि चैवम् ॥ ९ ॥ शय्यासनस्थानानि वि- हाय प्रतिश्रवणमभिक्रमणं वचनं नादृष्टेनाधःस्थानासनस्ति- र्यग्वा तत्सेवायाम् ॥ १० ॥ गुरुदर्शने चोत्तिष्ठेत्, गच्छन्तमनु- व्रजेत्, कर्म्म विज्ञाप्याख्यायाऽहूताध्यायी युक्तः प्रियहितयो- स्तद्भार्यापुत्रेषु चैवम् ॥ ११ ॥ नोच्छिष्टाशनस्नपनप्रसाधन- पादप्रक्षालनोन्मर्द्दनोपसंग्रहणानि ॥ १२ ॥ विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणां तत्पुत्रस्य च ॥ १३ ॥ नैके युवतीनाम् ॥ १४ ॥ व्यवहारप्राप्तेन सार्व्ववर्णिकं भैक्षचरणमभिशस्तपतितवर्ज्जम् ॥ १५॥ आदिमध्यान्तेषु भवच्छब्दः प्रयोज्यो वर्णानुपूर्व्येण॥१६॥
इसी प्रकार पूजा सत्कार के योग्य श्रेष्ठ उत्तम मान्य पुरुषों का नाम लेने में भी आचरण करे ॥ ९ ॥ गुरु जी जब कुछ कहें तब शय्या, आसन, और स्थान को छोड़के समीप जा कर गुरु के वचन को सुने किन्तु शय्यादि पर बैठा २ बात न करे। यदि गुरु जी खड़े हों तो उनके इधर उधर चलता हुआ बात करे, गुरु से अदृष्ट छिपा हुआ न बोले, गुरु से नीचे स्थलमें खड़ा हो वा बैठे, गुरु की सेवा में तिरछा भी न बैठा रहे ॥ १० ॥ गुरु के देखने पर खड़ा होजाय, और गुरुजी टहलने लगें तो पीछे २ चल, कोई भी काम हो गुरु को जता कर वा कह कर करे बिना पूछे कुछ न करे। गुरु जब पढ़ने को बुलावें तब नम्रता से समीप बैठ के पढ़ाकरे। गुरु का प्रिय और हित करने में तत्पर रहै। गुरु के स्त्री पुत्रों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव करे ॥ ११॥ उच्छिष्ट भोजन, स्नान कराना, प्रसाधन (श्रृंगार करना) पग धोना, शरीर मलना, वा उबटना, पगों का स्पर्श, ये काम गुरु की स्त्री पुत्रों के कभी न करे ॥ १२॥ जब परदेश से आवे तब गुरुपत्नियों और गुरुपुत्रों के भी पगों का स्पर्श करे ॥ १३ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि युवति गुरुपत्नी के पाद् स्पर्श न करे ॥ १४ ॥ व्यवहार (न्याय) से प्राप्त हुये वस्तु की भिक्षा सब वर्णों से मांग लेवे परन्तु हिंसक वा निन्दित और पतितों को छोड़देवे ॥ १५ ॥ ब्राह्मण के यहां भिक्षा मांगे तब (भवति ! भिक्षां देहि) क्षत्रिय के घर पर (भिक्षां भवति ! देहि) और वैश्यके घर में भिक्षा मांगने को जावे तब (भिक्षां देहि भवति !) ऐसा वाक्य कहे ॥ १६ ॥
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