अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 581, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥
तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षुर्वैखानस इति तेषां गृहस्थो योनिरप्रजनत्वादितरेषाम् ॥ १ ॥
तत्रोक्तं ब्रह्मचारिण आचार्य्याधीनत्वमात्रं गुरोः कर्म्मशेषेण जपेत्, गुर्वभावे तदपत्यवृत्तिस्तदभावे वृद्धे सब्रह्मचारिण्यग्नौ वा ॥२॥
एवं वृत्तो ब्रह्मलोकमेवाप्नोति जितेन्द्रियः॥३॥
उत्तरेषां चेतदविरोधी अनिचयो भिक्षुरूर्ध्वरेता ध्रुवशोली वर्षासु भिक्षार्थी ग्राममियात् ॥४॥
जघन्यनिवृत्तं चरेन् ॥५॥
निवृत्ताशीर्वाक्चक्षुः कर्म्मसंयतः॥६॥
कौपीनाच्छादनार्थं वासो बिभृयात्
कोई आचार्य ब्रह्मचारी के इस प्रकार आश्रमों का विकल्प कहते हैं कि वह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु (संन्यासी) वैखानस (वानप्रस्थ) इन गृहस्थादि तीनों आश्रमों को स्वीकार करे अथवा निम्न प्रकार जन्म भर केवल ब्रह्मचर्याश्रम ही रक्खे। इन सब आश्रमों का गृहस्थ मूल है क्योंकि अन्य तीनों में सन्तान नहीं होते, गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ के ब्रह्मचारी आदि बनते हैं। इससे गृहस्थ सब का मूल है ॥१॥
और उस प्रथम मुख्य आश्रम में ब्रह्मचारी को आचार्य की आधीनता सेवा करना मात्र ही मुख्य कर्म है। गुरु सेवा के कामों से जितना अवकाश मिले उसमें वेद पाठ वा गायत्री का जप करे। गुरु के स्वर्गवास होने पर सुपात्र हों तो गुरुपुत्रों की सेवा में रहे। उनके भी अभाव में अपने से वृद्ध साधर्मी ब्रह्मचारी की वा अग्नि की सेवा जन्म भर करे ॥२॥
ऐसा बर्ताव करता हुआ ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होने से ब्रह्मलोक को ही प्राप्त होता है ॥३॥
और ब्रह्मचारी का यह काम अगले तीनों [गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस] का विरोधी नहीं है। ब्रह्मचारी अन्नादि का संचय न करे, ऊर्द्धरेता [वीर्य जिस का मस्तक तक चढ़ गया हो इस से नीचे को कदापि न गिरे मस्तक में परमोत्तम शक्ति बढ़ जाय] भिक्षा मांग कर खाया करे, वर्षाकाल में ध्रुवशील (चले फिरे नहीं एक स्थान में) रहे, केवल भिक्षा के लिये ग्राम में जावे ॥४॥
नीचों को छोड़ कर उत्तमों से भिक्षा मांगे ॥ ५ ॥
किसी से आशीर्वाद न चाहे, वाणी, नेत्र, अपने हाथ, पांव, आदि को वश में रक्खे चंचल न करे ॥६॥
कौपीन, और केवल ओढ़नेके वस्त्रको धारणकरे ॥७॥