अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 582, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१० गौतमस्मृतिः ॥
॥७॥ प्रहीणमेके निर्णेजनाविवृधुक्तम् ॥८॥ ओषधिवनस्पतीना- मङ्गमपाददीत ॥९॥ न द्वितीयामपहर्तुं रात्रिं ग्रामे वसेत् ॥ १० ॥ मुण्डः शिखी वा वर्ज्जयेज्जीववधम् ॥ ११ ॥ समो भूतेषु हिंसानुग्रहयारनार्थी ॥१२॥ वैखानसो वने मूलफला- शी तपःशीलः श्रामणकेनाग्निमाधायाग्राम्यभोजी देवपितृ- मनुष्यभूतर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्ज्जं भैक्षमप्युप- युञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेत्, ग्रामं च न प्रविशेत्, जटि- लश्चीराजिनवासा नातिशयं भुञ्जीत ॥ १३ ॥ ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद्गार्हस्थ्यस्य ॥ १४ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥
कोई आचार्य कहते हैं कि गुरु के पुराने वस्त्रों को धारण करे जो निर्मल सफेद न हों और धोबी से धुलाये न हों, किन्तु खाकी आदि हों ॥ ८ ॥ अथवा ओषधी वा वनस्पतियों के वक्कल वा पत्ते आदि के वस्त्र बनावे। अथवा इस सूत्र का द्वितीयार्थ यह हो सकता है कि ओषधि वनस्पतियों के कन्द, मूल, फलादि खाके निर्वाह करे भिक्षा भी न मांगे ॥ ९ ॥ दूसरी बार भिक्षा के लिये रात को ग्राम में न बसे ॥ १० ॥ शिर के सब बाल मुंडाया करे, अथवा केवल चोटी रक्खे, जीवों की हिंसा न करे ॥ ११ ॥ सब प्राणियों पर सम उदासीन दृष्टि रक्खे, न किसी को दुःख देवे, और न किसी पर अधिक दया वा कृपा करे। स्वयं दुःख भी न माने न हर्ष माने ॥१२॥ वानप्रस्थ के धर्म ये हैं कि वन में रहता हुआ मूल वा फल खावे, परिश्रम के साथ पंचाग्नि ताप करे, तपस्वी हो, ग्राम का भोजन न करे, पञ्चमहायज्ञां द्वारा देव, पितर, मनुष्य, ( अतिथि ) ऋषि इन को पूजे, और सबका अतिथि के तुल्य आदर करे, निषिद्धों ( निन्दित शूद्रादि वा दुराचारियों ) को छोड़कर भिक्षा को भी मांग ले, जोते हुए खेत में न बैठे, वा निवास न करे, जोतने से जो पैदा हो उस अन्न को न खावे, ग्राम में भी प्रवेश न करे, वा न बसे, जटाओं को धारण करे, शिर के बाल न मुंडावे । चीर नाम फटे पुराने चिथरे वा मृग चर्म के वस्त्र रक्खे, भोजन में अधिक अन्न वा फलादि को न खावे ॥१३॥ वेद में गृहस्थ का प्रत्यक्ष विधान होने से कोई २ आचार्य लोग यह कहते हैं कि एक गृहस्थाश्रम ही रक्खे बानप्रस्थादि न बने ॥ १४ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥