अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ गौतमस्मृतिप्रारम्भः
वेदो धर्ममूलं तद्विदां च स्मृतिशीले ॥१॥ दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महतां नतु दृष्टोऽर्थोऽवरदौर्बल्यात्तुल्यबलविरोघे विकल्पः ॥२॥ उपनयनं ब्राह्मणस्याष्टमे नवमे पंचमे वा काम्यं गर्भादिः संख्यावर्षाणां तद्द्वितीयं जन्म ॥३॥ तद्यस्मात्स आचार्यों वेदानुवचनाच्च ॥ ४ ॥ एकादशद्वादशयोः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ५ ॥ आषोडशाद्ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री द्वाविंशतेराजन्यस्य द्व्यधिकाया वैश्यस्य ॥६ ॥ मौञ्जीज्यामौर्वी सौत्र्यो मेखलाः क्रमेण कृष्णरुरुबस्ताजिनानि
भाषार्थः—धर्मका मूल वेद है और वेदको जानने वाले मनु आदि महर्षियों के स्मृति और स्वभाव भी धर्मके मूल हैं ॥ १ ॥ धर्मका व्यतिक्रम (कुछ का कुछ हो जाना) और धर्मबाधक साहस [बिना विचारे काम करना] भी देखा जाता है। परन्तु महापुरुषों के विचार से दृष्टार्थ (जिस का फल इसी लोक में हो) धर्म उत्तम नही है। दृष्टार्थ अदृष्टार्थ दोनों में तुल्य बल विरोध प्रतीत हो तो अवर नाम दृष्टार्थ के निर्बल होने से अदृष्टार्थ को मुख्य जानो ॥ २ ॥ ब्राह्मण का यज्ञोपवीत गर्भस्थिति के समय से आठवें वा नववें वर्ष में करना चाहिये। यदि ब्रह्मतेज की कामना से उपनयन करना होय तो पांचवें वर्ष में करे। वर्षों की गिनती सर्वत्र गर्भसे लेनी चाहिये। यज्ञोपवीत संस्कार दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥ द्वितीय जन्मका दाता आचार्य है। वेद पढ़ाने से भी आचार्य द्वितीय जन्म का पिता है ॥ ४ ॥ ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत करना चाहिये ॥ ५ ॥ सोलह वर्ष तक ब्राह्मण बाईस वर्ष तक क्षत्रिय और चौबीस वर्ष तक वैश्य सावित्री नाम अपने २ गुरु मन्त्र से पतित नहीं होते अर्थात् मन्त्रोपदेश के गौण अधिकारी रहते हैं ॥ ६ ॥ ब्राह्मण की मूंज की क्षत्रिय की मूर्वा नामक घास की