अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२ गौतमस्मृति ॥
वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषां कार्पासं चाविकृतम् ॥ ७ ॥ काषायमप्येके ॥ ८ ॥ वार्क्षं ब्राह्मणस्य माञ्जिष्ठहारिद्रे इतरयोः ॥ ९ ॥ बैल्वपालाशौ ब्राह्मणस्य दण्डौ ॥१०॥ आश्वत्थपैलवौ शेषे ॥ ११ ॥ यज्ञिया वा सर्वेषाम् ॥ १२ ॥ अपीडितायूपवक्राः सबल्कला मूर्द्धललाटनासाग्रप्रमाणा मुण्डजटिलशिखाजटाश्च ॥ १३ ॥ द्रव्यहस्तउच्छिष्टोऽनिधायाचामेत् ॥ १४ ॥ द्रव्यशुद्धिः परिमार्जनप्रदाहतक्षणनिर्णेजनानि तैजसमार्त्तिकदारवतान्र्तवानाम् ॥ १५ ॥ तैजसवदुपलमणिशंखशुक्तीनां दारुवदस्थिभूम्योरावपनं च
और वैश्य ब्रह्मचारी की सूत की मेखला नाम कन्धनी बनावे। काले मृग का रुरुमृग का, और बकरे का चर्म, शण अलसी, और पहाड़ी ऊन के वस्त्र क्रम से हों अथवा कोई आचार्य यह कहते हैं कि तीनों वर्षों के ब्रह्मचारियों को कपासके नवीन वस्त्र हों ॥ ७ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि गेरूंमें रंगे वस्त्र सब ब्रह्मचारी धारण करें ॥ ८ ॥ वृक्ष की बल्कल का खाखी वा बदामी सुनहरी रंग का वस्त्र ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, मजीठ का लाल रंग क्षत्रिय का और हल्दी का पीला रंग वैश्य ब्रह्मचारी के वस्त्रों का होना चाहिये ॥ ९ ॥ बेल वा ढांक का दण्ड ब्राह्मण का हो ॥ १० ॥ पीपल का क्षत्रिय और पीलू [ जाल वृक्ष ] का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी धारण करे ॥ ११ ॥ अथवा सब वर्णों के ब्रह्मचारी किसी यज्ञिय वृक्ष का दण्ड धारण करें ॥ १२ ॥ और वे तीनों दण्ड फटे टूटे नहीं वा यज्ञके यूपस्तम्भ कीसी बनावट के हों, बल्कल सहित हों, ब्राह्मण का दण्ड मूर्द्धा तक, क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नासिका तक प्रमाण का हो, और तीनों ब्रह्मचारी मुण्ड, जटिल, अथवा केवल शिखामात्रजटा रखने वाले हों ॥ १३ ॥ यदि कोई द्रव्य (वस्तु) हाथ में होय और उच्छिष्ट हो जाय तो उस को नीचे रक्खे विना ही आचमन करे ॥ १४ ॥ अब द्रव्यों की शुद्धि कहते हैं-तेजस् धातु के पात्रों की मांजने धोने से, मट्टी के पात्रों की फिर अग्नि में पकाने से, लकड़ी के पात्रों की छीलने से, और सूत के वस्त्रों की पखोरने से शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ पत्थर, मणि (मूंगा) शंख, सीपी, इन की शुद्धि तेजस (धातु) के समान मांजने धोने से होती है। हड्डी से बने पदार्थों और भूमिकी शुद्धि काष्ठ के समान छीलने से होती है।