अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 575, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ३
भूमेरश्चै लवद्रज्जुविदलचर्म्मणामुत्सर्गो ऽवात्यन्तोपहतानाम्। १६ प्राङ्मुखउदङ्मुखो वा शौचमारभेत् ॥ १७ ॥ शुचौ देश आसीनो दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा कृत्वा यज्ञोपवीत्यामणि- बन्धनात्पाणी प्रक्षाल्य वाग्यतो हृदयस्पृशस्त्रिश्चतुर्वाऽप- आचामेद् द्विःपरिमृज्यात्पादौ चाभ्युक्षेत् खानिचोपस्पृशे- च्छीर्षण्णानि मूर्द्धनि च दद्यात् ॥ १८ ॥ सुप्त्वा भुक्त्वा क्षुत्वा चपुनः ॥ १९ ॥ दन्तश्लिष्टेषु दन्तवदन्यत्र जिह्वा भिमर्शनात् प्राक्च्युतेरित्येके ॥ २० ॥ च्युतेरास्राववद्विद्यान्निगिरन्नेवत- च्छुचिः ॥ २१॥ न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्ति ताश्चेदङ्- गे निपतन्ति ॥ २२॥ लेपगन्धापकर्षणे शौचममेध्यस्य ॥२३॥ तदद्भिः पूर्वं मृदा च मूत्रपुरीषरेतोविसंसनाभ्यवहारसंयोगेषु
भूमि की शुद्धि जोतने से भी होती है। रस्सी बिदल (बांस के पात्र) तथा चर्म पात्रों की शुद्धि वस्त्रों के समान पछारने से होती है। यदि ये सब अत्यन्त भ्रष्ट हो गये हों तो त्याग देवे ॥ १६ ॥ पूर्व को वा उत्तर को मुख करके शौच (मल मूत्र के त्याग) का प्रारंभ करै ॥१७॥ अब आचमन करने की विधि कहते हैं कि शुद्ध देश में बैठा दहिनी भुजा को गोड़ों के बीच करके सव्य यज्ञोपवीत धारण किये हुये गट्टों (पहुंचो) तक दोनों हाथ धोकर मौन हुआ जो हृदय तक पहुंचे इतने जल से तीन वा चार वार आचमन करै पश्चात् दो बार मुख को शुद्ध करै और पगों को भी धोवे। शिर के आंखें, नाक, कान, मुख इन सातों छिद्रों का स्पर्श करै और मूर्द्धा पर भी जल का मार्जन करै ॥ १८ ॥ शयन, भोजन, करके तथा छींक कर फिर आचमन और इन्द्रिय स्पर्श करै ॥१९॥ यदि जिह्वा से स्पर्श न हो तो दांतों में लगा अन्नादि दांतों के समान अशुद्ध नहीं है। कोई आचार्य यह कहते हैं कि जब तक दांतों से पृथक् न हो तब तक दांतों के समान है ॥ २० ॥ और दांतों से पृथक् होने पर आस्राव (मुख से जल गिरना) के समान है इस से उस को निगल लेने पर शुद्ध हो जाता है ॥ २१ ॥ जो मुख के जल की बूंद वा छींटें अपने अंग पर गिरें तो वे अशुद्ध नहीं करतीं ॥ २२ ॥ अशुद्ध वस्तु का लेप और गन्ध दूर कर देने पर अशुद्ध वस्तु के लगी अशुद्धि निवृत्त हो जाती है ॥ २३ ॥ उस अशुद्ध वस्तु को प्रथम