अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ दक्षस्मृतिः ॥
अद्वैतानांप्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रस्यनिश्चयः ॥ ५४ ॥
अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंयोनपश्यति ।
अतःशास्त्राण्यधीयन्ते श्रूयन्तेग्रन्थविस्तराः ॥ ५५ ॥
दक्षशास्त्रेयथाप्रोक्तमाश्रमप्रतिपालनम् ।
अधीयन्तेतुयेविप्रास्तेयान्त्यमरलोकताम् ॥ ५६ ॥
इदंतुयःपठेद्भक्त्या श्रृणुयादपियोनरः ।
सपुत्रपौत्रपशुमान् कीर्त्तिंचसमवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥
श्रावयित्वात्विदंशास्त्रं श्राद्धकालेऽपियोद्विजः ।
अक्षय्यंभवतित्छ्राद्धं पितॄंश्चैवोपतिष्ठते ॥ ५८ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इति दक्षस्मृतिः समाप्ता ॥
शास्त्रानुसार जैसा निश्चय है उस को कहते हैं ॥ ५४ ॥ इस अद्वैत विषय में जो अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता इसी से शास्त्रों को पढ़ते और ग्रन्थों के विस्तारों को सुनते हैं ॥ ५५ ॥ दक्ष ऋषि के इस धर्म शास्त्र में कहे आश्रमों के धर्म का प्रतिपालन करते और जो ब्राह्मण इस धर्म शास्त्र को पढ़ते हैं वे देवलोक को प्राप्त होते हैं ॥ ५६ ॥ जो इस शास्त्र को भक्ति से पढ़े अथवा जो अधम वर्ण भी इस को सुने वह मनुष्य पुत्र पौत्र और पशु-ओं वाला होकर कीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ श्राद्ध के समय इस शास्त्र को जो द्विज सुनाता है। उस का श्राद्ध अक्षय फलदायी होता और पितरों को श्राद्ध का फल प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥
यह दक्षस्मृति के पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ और यह स्मृति भी समाप्त हुई ॥