अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 568, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ | दक्षस्मृतिः ॥
तत्सूक्ष्मत्वादनिर्देश्यं परंब्रह्मसनातनम् ॥ २७ ॥
बुधास्त्वाभरणंभारं मलमालेपनंतथा ।
मन्यन्तेस्त्रीचमूर्खश्च तदेवबहुमन्यते ॥ २८
सत्वोत्कटाःसुराःसर्वे विषयैश्चवशीकृताः ।
प्रमादिनिक्षुद्रसत्त्वे मनुष्येचात्रकाकथा ॥ २९ ॥
तस्मात्त्यक्तकषायेन कर्तव्यंदण्डधारणम् ।
इतरस्तुनाशक्नोति विषयैरभिभूयते ॥ ३० ॥
नस्थिरंक्षणमप्येकमुदकंचयथोर्मिभिः ।
वाताहतंतथाचित्तं तस्मात्तस्यनविश्वसेत् ॥ ३१ ॥
ब्रह्मचर्यंसदारक्षेद्दष्टधामैथुनंपृथक् ।
स्मरणंकीर्तनंकेलिः प्रेक्षणंगुह्यभाषणम् ॥ ३२ ॥
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेवच ।
एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ ३३ ॥
वैणवेनत्रिदण्डेन नत्रिदण्डीतिकथ्यते ।
के अयोग्य नहीं) है ॥२७॥ पण्डित लोग आभूषणों के धारण को बोझा तथा शरीर पर मलिनता का लेपन मानते हैं। स्त्री और मूर्ख लोग आभूषण को ही बहुत उत्तम मानते हैं ॥ २८ प्रबल सत्व गुण वाले सब देवता भी विषयों ने जब अपने वशमें करलिये तब प्रमादी (भूल में पड़े) कम सत्त्व गुण वाले मनुष्यों के कामादि वश होनेका कहना ही क्या है ! ॥ २९ ॥ तिससे जिस ने मन की मलिनता त्यागी हो वह विषयों के साथ युद्ध करने के लिये दंड का धारण करै। जिस ने मन की मलिनता नहीं त्यागी वह दंड धारण के लिये समर्थ नहीं होता, क्योंकि विषय ही उस को दबालेते हैं ॥ ३० ॥ जैसे तरंगों के उठने से जल एक क्षण मात्र भी स्थिर नहीं रहता इसी प्रकार विषय वासनाओं के वायु से चलायमान हुए चित्त का भी अनुचित विषयों में न फंसने का विश्वास न करै ॥ ३१ ॥ आठो प्रकार के मैथुन से ब्रह्मचर्य की सदैव रक्षा करै । सुन्दरी युवति स्त्रियों का स्मरण, कीर्तन (उन के अङ्ग प्रत्यङ्गों का वर्णन करना, क्रीड़ा (स्त्रियों के साथ खेलना) प्रेक्षण (देखना) एकान्त में बातें करना, संकल्प (स्त्री संग का मनोरथ होना) अध्यवसाय (संग करने का दृढ़ निश्चय) क्रिया की सिद्धिअर्थात् साक्षात् संयोग करना यह आठ प्रकार का मैथुन बुद्धिमान् कहते हैं ॥३३॥ बांस के त्रिदण्ड रखने से संन्यासी