अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 567, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३१
बहिर्मुखानिसर्वाणि कृत्वाचान्तर्मुखानिवै ।
एतद्ध्यानंतथाज्ञानं शेषस्तुग्रन्थविस्तरः ॥ २२ ॥
त्यक्त्वाविषयभोगांस्तु मनानिश्चलताङ्गतम् ।
आत्मशक्तिस्वरूपेण समाधिःपरिकीर्तितः ॥ २३ ॥
चतुर्णांसन्निकर्षेण फलंयत्तदशाश्वतम् ।
द्वयोस्तुसन्निकर्षेण शाश्वतंपदमव्ययम् ॥ २४ ॥
यन्नास्तिसर्वलोकस्य तदस्तीतिविरुद्धयते ।
कथ्यमानंतथान्यस्य हृदयेनावतिष्ठते ॥ २५ ॥
स्वयंवेद्यंचतद्ब्रह्म कुमारीमैथुनंयथा ।
अयोगीनैवजानाति जात्यन्धोहियथाघटम् ॥ २६ ॥
नित्याभ्यसनशीलस्य स्वसंवेद्यंहितद्भवेत् ।
बहिर्मुख (विषयों में लगी) सब इन्द्रियों को अन्तर्मुख (आत्मा में लीन) करके जो योगी रहता है, यही ध्यान और ज्ञान है। बाकी सब ग्रन्थों का विस्तार है ॥ २२ ॥ संसारी विषय भोगों को त्याग कर आत्मा की शक्ति रूप से निश्चय कर निश्चल हुआ जो मन उसे समाधि कहते हैं ॥ २३ ॥ चारो आश्रम के सामान का संग्रह से वा चार आश्रमियों के मेल से जो फल होता है वह अनित्य है और पिछले दो आश्रमी वानप्रस्थ तथा संन्यासी के मेल से सनातन अविनाशी ब्रह्मपद प्राप्त होता है। सब लोगों को जो ब्रह्म नास्ति अभावसा प्रतीत होता है। वह अस्ति शब्द से कहना विरुद्ध पड़ता है इसी से कहा हुआ भी दूसरे के हृदय में नहीं ठहरता अचल विश्वास नहीं जमता ॥ २५ ॥ वह ब्रह्म इस प्रकार स्वयं जानने योग्य है कि जैसे कुमारी का मैथुन (युवति स्त्री को अनुकूल युवा पतिके प्रथम ही संयोग में जो आनन्द होता है वह अकथनीय स्वयं ज्ञेय होता है वैसे ही ब्रह्मज्ञान का आनन्द भी कहने में नहीं आ सकता) और योग मार्ग से हीन पुरुष उस ब्रह्म को इस प्रकार नहीं जानता जैसे जन्मान्ध पुरुष घट के रूप को नहीं देख सकता ॥२६॥
नित्य योगाभ्यास के स्वभाव वाले मनुष्य को अनायास से ब्रह्म स्वयं जानने योग्य होता है। वह सूक्ष्म होने से सनातन पर ब्रह्म अनिर्देश्य (दिखाने