अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 566, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३० दक्षस्मृतिः ॥
विषयेन्द्रियसंयोगं केचिद्योगंवदन्तिवै । अधर्मोधर्मबुद्ध्यातु गृहीतस्तैरपण्डितैः ॥ १५ ॥
आत्मनोमनसश्चैव संयोगन्तुततःपरम् । उत्तानमनसोह्येते केवलंयोगवञ्चिताः ॥ १६ ॥
वृत्तिहीनंमनःकृत्वा क्षेत्रज्ञंपरमात्मनि । एकीकृत्यविमुच्येत योगोऽयंमुख्यउच्यते ॥ १७ ॥
कषायमोहविक्षेप लज्जाशङ्कादिचेतसः । व्यापारास्तुसमाख्यातास्तान्जित्वावशमानयेत् ॥१८॥
कुटुम्बैःपञ्चभिर्ग्रामः षष्ठस्तत्रमहत्तमः । देवासुरैर्मनुष्यैश्च सजंतुर्नैवशक्यते ॥ १९ ॥
मनसैवेन्द्रियाण्यत्र मनश्चात्मनियोजयेत् । सर्वभावविनिर्मुक्तं क्षेत्रज्ञंब्रह्मणिन्यसेत् ॥ २० ॥
बलेनपरराष्ट्राणि गृह्णन्शूरस्तुनोच्यते । जितोयेनेन्द्रियग्रामः सशूरःकथ्यतेबुधैः ॥ २१ ॥
कोई मनुष्य विषय और इन्द्रियों के संयोग को ही योग कहते हैं। उन निर्बुद्धियों ने अधर्म को धर्म बुद्धि से ग्रहण किया जानो ॥१५॥ तथा अन्य कोई लोग आत्मा और मन के संयोग को योग कहते हैं। ये लोग उत्कृष्ट चित्त वाले होने से केवल योग से वञ्चित रहते हैं ॥ १६ ॥ मन को वृत्तियों से हीन निश्चल करके और क्षेत्रज्ञ आत्मा को परमात्मा में एक करके मुक्त हो जाय यह मुख्य योग कहा है ॥ १७ ॥ कषाय (मन की मलिनता) मोह (अविद्या) विक्षेप (चित्त की चञ्चलता) लज्जा और शंका इत्यादि चित्त के व्यापार कहे हैं। उन कषायादि व्यापारों को जीत कर मन को वश में करे ॥ १८ ॥ पांच कुटुम्बों (५ इन्द्रियों) का ग्राम होता है और उस ग्राम में छठा (मन) अत्यन्त बड़ा है उस को देवता मनुष्य और असुर भी जीतने को समर्थ नहीं होते ॥ १९ ॥ इन्द्रियों को मन से रोक कर और मन को आत्मा में युक्त करे और सब भावों (पदार्थों) से रहित क्षेत्रज्ञ आत्मा को ब्रह्म में लीन करे ॥२०॥ जो बल से पराये राज्यों को छीन ले वह शूर नहीं कहाता किन्तु विद्वान् जन उसे ही शूर कहते हैं जिस ने सब इन्द्रियों को जीत लिया है ॥ २१ ॥