अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २९
पुनः पुनश्चनिर्वेदाद्योगः सिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ८
आत्मचिन्ताविनोदेन शौचेनक्रीडनेनच ।
सर्वभूतसमत्वेन योगःसिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ९ ॥
यश्चाऽऽत्ममिथुनोनित्यमात्मक्रीडस्तथैवच ।
आत्मानन्दस्तुसतत मात्मन्येवसमाहितः ॥ १० ॥
अस्मिन्नेवसुतृप्तश्च संतुष्टोनाऽन्यमानसः ।
आत्मन्येवसुतृप्तस्य योगोभवतिनान्यथा ॥ ११ ॥
सुप्तोऽपियोगयुक्तञ्च जाग्रदेवविशेषतः ।
ईदृक्चेष्टःस्मृतःश्रेष्ठो वरिष्ठोब्रह्मवादिनाम् ॥ १२ ॥
अस्त्वात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंनैवपश्यति ।
ब्रह्मभूतःसएवेह दक्षपक्षउदाहृतः ॥ १३ ॥
विषयासक्तचित्तोहि कश्चिद्योगंनविन्दति ।
यत्नेनविषयासक्तिं तस्माद्योगीविवर्जयेत् ॥ १४ ॥
ही अटल श्रद्धा विश्वास होने और बार वार संसार से प्रबल उदासीनता वैराग्य होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ परमात्मा की चिन्ता के आनंद, शौच, अपने आत्मा में ही क्रीड़ा करने और सब प्राणियों में समदृष्टि होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥९॥ जो नित्य ही आत्म विचार में आनन्दित, आत्मा क्रीड़ा में तत्पर, अपने आत्मा में ही आनन्द मानने वाला और निरंतर एकाग्र चित्त से अपने आपे में रहने वाला ॥ १० ॥ इसी अध्यात्म विचार में सम्यक् तृप्त और मन से संतुष्ट रहे अन्य बात में जिस का मन न लगता हो और आत्मा में ही अच्छे प्रकार तृप्त पुरुष को योग सिद्ध होता है, अन्य था नहीं ॥ ११ ॥ सोता हुआ भी योगी विशेष कर जागता ही है, ऐसी जिस की चेष्टा हो, वही श्रेष्ठ तथा ब्रह्मवादियों में बड़ा है ॥ १२ ॥ जो योगी विद्वान् अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता अर्थात् सब प्राणियों को एक ब्रह्मात्मरूप अभेद भाव से देखता है वही ब्रह्मरूप दक्ष ऋषि के पक्ष में कहा है ॥ १३ ॥ विषयों में जिसका चित्त आसक्त है, वह कोई भी योग को प्राप्त नहीं होता तिससे योगी पुरुष विषयों की फसावट को बड़े यत्न से छोड़ देवे ॥ १४ ॥