अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ दक्षस्मृतिः ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि योगस्यविधिमुत्तमम् ।
लोकावशीकृतायेन येनचात्मावशीकृतः ॥ १ ॥
इन्द्रियार्थास्तपस्तस्य योगंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २ ॥
प्राणायामस्तथाध्यानं प्रत्याहारोऽथधारणा ।
तर्कश्चैवसमाधिश्च षडङ्गोयोगउच्यते ॥ ३ ॥
मैत्रीक्रियामुदेसर्वा सर्वप्राणिव्यवस्थिता ।
ब्रह्मलोकंनयत्याशु धातारमिवधारणा ॥ ४ ॥
नारण्यसेवनाद्योगो नानेकग्रन्थचिन्तनात् ।
व्रतैैर्यज्ञैस्तपोभिर्वा नयोगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ५ ॥
नचपद्मासनाद्योगो ननासाग्रनिरीक्षणात् ।
नचशास्त्रातिरिक्तेन शौचेनभवतिक्वचित् ॥ ६ ॥
नमन्त्रमौनकुहकैरनेकैःसुकृतैस्तथा ।
लोकयात्राभियुक्तस्य न योगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ७ ॥
अभियोगात्तथाभ्यासात्तस्मिन्नेवसुनिश्चयात् ।
अब आगे योग का उत्तम विधान कहते हैं । संसारी लोगों को और अपने आप को जिस ने वश में किया है ॥ १ ॥ इन्द्रिय और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये विषय, ये सब जिसने वश में किये हैं, जो तप करने को तत्पर हो, उस के लिये संपूर्ण योग कहते हैं ॥ २ ॥ प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि ये छः जिस के अंग ( भाग ) हैं उसे योग कहते हैं ॥ ३ ॥ आनन्द प्राप्ति के लिये सब प्राणियों के साथ ईर्ष्या द्वेष बैर विरोध छोड़ के मित्र दृष्टि करे, वह मैत्री योगी को ऐसे ब्रह्मलोक में लेजाती है जैसे धारणा ब्रह्मा जी को ब्रह्मलोक में पहुंचाती है ॥ ४ ॥ केवल वन में रहने से या अनेक ग्रंथों को शोधने विचार ने से, व्रत, यज्ञ और तप करने से किसी को योग नहीं होता ॥ ५ ॥ पद्मासन लगा के बैठसे, नाक के अग्रभाग को देखने से और शास्त्रविरुद्ध अधिक शुद्धि करने से भी योग कभी नहीं होता ॥ ६ ॥ मन्त्र जपने, मौन रहने धूनी लगाने, और अनेक प्रकार के पुण्य करने से और लोक के व्यवहारों में तत्पर रहने, से भी योग नहीं होता ॥ ७ ॥ योग के विचार में तत्परता होने, बार २ लगा तार योग का अभ्यास करने, योग में