अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ दक्षस्मृतिः ॥
दृष्टमेवफलंतत्र नादृष्टमुपपद्यते ॥ १३ ॥ धर्मपत्नीसमाख्याता निर्दोषायदिसाभवेत् । दोषेसतिनदोषःस्यादन्याकार्यागुणान्विता ॥ १४ ॥ अदुष्टांपतितांभार्यां यौवनेयःपरित्यजेत् । सजीवनन्तेस्त्रीत्वंच वन्ध्यत्वञ्चसमाप्नुयात् ॥ १५ ॥ दरिद्रंव्याधितञ्चैव भर्तारंयावमन्यते। शुनीगृध्रीचमकरी जायतेसापुनःपुनः ॥ १६ ॥ मृतेभर्त्तरियानारी समारोहेद्धुताशनम् । साभवेत्सुभाचारा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ व्यालग्राहोयथाव्यालं बलादुद्धरतेबिलात् । तथासापतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ १८ ॥ चाण्डालप्रत्यवसितपरिव्राजकतापसाः । तेषांजातान्यपत्यानि चाण्डालैस्सहवासयेत् ॥ १९ ॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
परलोक में कुछ नहीं ॥ १३ ॥ यदि शास्त्रोक्त विधि से विवाहिता स्त्री में कोई दोष न हो तो, वह धर्मपत्नी कहाती है। यदि उसमें दोष हो तो भी चिन्ता नहीं क्योंकि उस दशा में अन्य गुणवती से विवाह कर लेवे ॥ १४ ॥
जो पुरुष व्यभिचारादि दोष से रहित पतित स्त्री को युवावस्था में त्याग देवे वह मर कर बन्ध्या स्त्री होती है ॥ १५ ॥ जो स्त्री रोगी पति का तिरस्कार करती है। वह कुतिया, गीधपक्षिणी, और मगरयोनि में बारम्बार जन्म लेती है ॥ १६ ॥ पति के मरने पर जो स्त्री अग्नि में भस्म हुई सती होती है वह शुभ आचरण वाली होती और स्वर्ग में पूजा को प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
जैसे सांपों को पकड़ने वाला बिल में से सांप को बल से निकाल लेता है। वैसे ही वह स्त्री भी अधोगति को प्राप्त हुए अपने पति का उद्धार करके उसी पति के संग स्वर्ग में आनन्द भोगती है ॥१८॥ चाण्डाल, पतित, संन्यासी और तपस्वी इन चारोंके किसी स्त्री से व्यभिचार द्वारा यदि सन्तान उत्पन्न हों तो. उनको चाण्डालों के संग ही बसावे ॥ १९ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥