भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाऽर्थसहिता ॥ २३

उक्तं शौचमशौचं च कार्यंत्याज्यं मनीषिभिः । विशेषार्थंतयोः किंचिद्वक्ष्यामिहितकाम्यया ॥ १ ॥ शौचेयत्नःसदाकार्यः शौचमूलोद्विजःस्मृतः । शौचाचारविहीनस्य समस्तानिष्फलाःक्रियाः ॥ २ ॥ शौचंचद्विविधंप्रोक्तं बाह्यमाभ्यन्तरंतथा । मृज्जलाभ्यांस्मृतंबाह्यं भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥ ३ ॥ आशौचाद्विवरंबाह्यं तस्मादाभ्यन्तरंवरम् । उभाभ्यान्तुशुचिर्यस्तु सशुचिर्नेतरःशुचिः ॥ ४ ॥ एकालिङ्गेगुदेतिस्रो दशवामक रेतथा । उभयोःसप्तदातव्या मृदस्तित्रस्तुपादयोः ॥ ५ ॥ गृहस्थेशौचमाख्यातं त्रिष्वन्येषुक्रमेणतु । द्विगुणं त्रिगुणं चैव चतुर्थस्यचतुर्गुणम् ॥ ६ ॥ अर्द्धप्रसृतिमात्रान्तु प्रथमामृत्तिकास्मृता । द्वितीयाचतृतीयाच तदर्द्धापरिकीर्त्तिता ॥ ७ ॥


मन को वशी करने वाले विद्वान् ऋषि आचार्यों ने शुद्धि, अशुद्धि, करने तथा त्यागने योग्य काम कहे हैं उनदोनों प्रकारके कर्त्तव्यों में मनुष्योंके हित की इच्छासे हम कुछ विशेष विचार कहते हैं ॥१॥ शुद्धि करनेका सदैव प्रबल उपाय करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मण पन की स्थिति या पुष्टिका मूल कारण शौच ही है। शौच और शुद्ध आचारण से जो हीन है, उसके सब कर्म निष्फल हैं ॥२॥ शुद्धि दो प्रकार की है, एक बाह्य (बाहर की) और दूसरी आभ्यन्तर (भीतर की) बाह्य शरीरकी शुद्धि मट्टी और जलसे होती तथा भीतरी शुद्धि मनको छल कपट रहित करनेसे होती है ॥३॥ अशुद्ध रहनेसे बाह्य शुद्धि उत्तम है और बाह्य शुद्धि से आभ्यन्तर श्रेष्ठ है। इन दोनों प्रकार से जो शुद्धि करता है वही ठीक शुद्ध है, अन्य नहीं ॥ ४ ॥ लिंग में एक बार, गुदा में तीन बार, एक वांयें हाथ में दशवार, दोनों हाथों में मिला के सात बार और दोनों पगों में तीन २ बार मट्टी लगावे ॥ ५ ॥ यह शुद्धि गृहस्थियों की कही है, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासी इन तीनों का क्रमशः गृहस्थ से दूनी तिगुनी, चौगुनी, शुद्धि करनी चाहिये ॥ ६ ॥ पहिली बार आधी पसली मट्टी लगानी कही है और दूसरी वा तीसरी वार में आधी मट्टी जानो ॥ ७ ॥