अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाऽर्थसहिता ॥ २१
अङ्गानातुधनंवित्तं मांसंवीर्यंबलंसुखम् ॥ ७ ॥ साशंकावालभावेतु यौवनेऽभिमुखीभवेत् । तृणवन्मन्यतेनारी वृद्धभावेस्वकंपतिम् ॥ ८ ॥ सुकाम्येवर्तमानाच स्नेहान्नैकैनिवारिता । सुमुख्यासाभवेत्पश्नाद्यथाव्याधिरुपेक्षितः ॥ ९ ॥ अनुकूलान्ववाग्दुष्टा दक्षासाध्वीपतिव्रता । एभिरेवगुणैर्युक्ता स्त्रीरिवस्त्रीनसंशयः ॥ १० ॥ प्रहृष्टमानसानित्यं स्थानमानविचक्षणा । भर्त्तुःप्रीतिकरीयातु भार्यासाचेतराजरा ॥ ११ ॥ शिष्योभार्याशिशुर्भ्राता मित्रंदासःसमाश्रितः । यस्यैतानिविनीतानि तस्यलोकेऽपिगौरवम् ॥ १२ ॥ प्रथमाधर्मपत्नीतु द्वितीयारतिवर्द्धिनी ।
केवल रुधिरको पीती है। परन्तु प्रतिकूल स्त्रियां पुरुषके धन, अन्न, मांस, वीर्य, बल और सुख इन सबको हरलेती हैं ॥७॥ बाल्य अवस्था में स्त्री अपने पतिकी कुछ आशंका भी करती है, यौवनावस्थामें पतिका सामना करने लगती, और वृद्ध अवस्था में स्त्री अपने पतिको तृणके समान समझती है॥८॥ अपनी इच्छानुसार काम करने में स्वतन्त्र हुई स्त्री को प्रेमके कारण यदि पति ने नहीं रोका तो पीछे वह स्त्री अपने पति का सामना करने लगती है कि जैसे उपेक्षा करने से व्याधि (रोग) बढ़के प्रबल हो कर दवा लेता है ॥ ९ ॥ जो स्त्री अनुकूल हो, जिसकी वाणी कोमल तथा प्रिय हो, जो चतुर बुद्धिमती हो, साध सरल स्वभाव की हो, और पतिव्रता हो, इन सब गुणोंसे युक्त स्त्री लक्ष्मी के तुल्य ही है, इस में संशय नहीं ॥ १० ॥ जो स्त्री मन से सदा प्रसन्न रहे, पति को बढाने और प्रतिष्ठा करने में प्रवीण हो, और जो पति में प्रीति रखने वाली हो, वही भार्या (सच्ची पत्नी) है, इससे भिन्न दुःखदायी जीर्ण करनेवाली है ॥११॥ शिष्य, भार्या, बालक, भाई, मित्र, सेवक, और जो अपने आश्रित शरणागत जिसके, ये शिष्यादि सब विनीत [नम्र कोमल वा शिक्षित] हैं उस की जगत में भी बड़ाई है ॥ १२ ॥ पहिली स्त्री धर्म पत्नी, दूसरी रति (कामासक्ति) बढ़ाने वाली होती है । उस स्त्री का फल इस लोक में प्रत्यक्ष ही होता है