अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२० दक्षस्मृतिः ॥
पत्नीमूलंगृहंपुंसां यदिच्छन्दानुवर्तिनी । गृहाश्रमात्परंनास्ति यदिभार्यावशानुगा । तयाधर्मार्थकामानां त्रिवर्गफलमश्नुते ॥ १ ॥ अनुकूलकलत्रोयः स्वर्गस्तस्यनसंशयः । प्रतिकूलकलत्रस्य नरकोनात्रसंशयः ॥ २ ॥ स्वर्गेऽपिदुर्लभंह्येतदनुरागःपरस्परम् । रक्तमेकंविरक्तंच ततःकष्टतरंनुकिम् ॥ ३ ॥ गृहवासःसुखार्थोहि पत्नीमूलंचतत्सुखम् । सापत्नीयाविनीतास्याच्चित्तज्ञावशवर्त्तिनी ॥४॥ दुःखान्वितासदाखिन्ना छिद्रंपीडापरस्परम् । प्रतिकूलकलत्रस्य द्विदारस्यविशेषतः ॥ ५ ॥ जलौकाइवताःसर्वा भूषणच्छादनाशनैः । सुकृतापकृतानित्यं पुरुषंह्यपकर्षति ॥ ६ ॥ जलौकारक्तमादत्ते केवलंसातपस्विनी ।
यदि आज्ञाकारिणी हो तो घर का मूल पत्नी ही है और यदि स्त्री वश में हो तो, गृहस्थाश्रम से परे और कोई श्रेष्ठ नहीं है उस स्त्री के साथ ही धर्म अर्थ काम के त्रिवर्ग फल को भोगना है ॥१॥ जिस की स्त्री सर्वथा अनुकूल, हो उस को घर में ही स्वर्ग है इस में संशय नहीं । और जिस की स्त्री प्रतिकूल पति से विरुद्ध है उस को घर ही नरक है इस में भी संदेह नहीं ॥२॥ स्त्री पुरुष की परस्पर पूर्ण प्रीति का होना स्वर्ग में भी दुर्लभ है । एक प्रेम चाहने वाला हो और दूसरा विरक्त [प्रेमी न हो] इस से अधिक और क्या कष्ट हो सकता है ॥३॥ घर का बसना सुख के लिये है और उस सुख का मूल [कारण] धर्मपत्नी है । जो स्त्री नम्र कोमल हो, चित्त की बात को जानने वाली तथा सर्वथा पति के अधीन रहे, वही वास्तव में पत्नी है ॥४॥ जो स्त्री दुःख से युक्त,सदा खेद मानने वाली, परस्पर एक दूसरे को पीडित करे वा छिद्र देखे, ऐसी प्रतिकूल स्त्री वाले तथा विशेष कर दो स्त्री वाले पुरुष को घर में सदा दुःख ही है ॥ ५ ॥ जैसे जींकें (जलौका) जिसके लग जाती हैं उसका सब रुधिर पी लेती हैं । वैसे ही भूषण वस्त्र और भोजनादि से पालन करते हुए भी पति को वे अनेक स्त्रियां तङ्ग करती हैं ॥६॥ तपस्विनी जलौका-जोंक