अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ दक्षस्मृतिः ॥
वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुध्यति ॥ ७ ॥ अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच ह्यदत्त्वायैतुभुञ्जते । एवंविधानांसर्वेषां यावज्जीवंहिसूतकम् ॥ ८ ॥ व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा । क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥ ९ ॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ॥ श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥ १० ॥ नसूतकंकदाचित्स्याद्यावज्जीवन्तुसूतकम् । एवंगुणविशेषेण सूतकंसमुदाहृतम् ॥ ११ ॥ सूतकेमृतकेचैव तथाचमृतसूतके । एतत्संहतशौचानां मृताशौचेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायश्चनिवर्त्तते । दशाहात्तुपरंशौचं विप्रोऽर्हतिचधर्म्मवित् ॥ १३ ॥ दानंचविधिनादेयमशुभात्तारकंहितत् ।
दिन का, वैश्य को पन्द्रह दिन का, और शूद्र को महीने भर का सूतक लगता है ॥ ७ ॥ स्नान, होम, अतिथि पूजन आदि न करके जो भोजन करते हैं ऐसे सब मनुष्यों को जीवन पर्यन्त (अशौच) सूतक लगता है ॥८॥ रोगी, कदर्य (कञ्जूस,) सदैव ऋणी, क्रिया कर्मसे हीन, मूर्ख, और विशेष कर स्त्री ने जिसे जीत लिया हो ॥ ९ ॥ व्यसन (जुआ आदि) में जिस का चित्त आसक्त हो, नित्य जो पराधीन हो, श्रद्धा तथा त्याग (वैराग्य) से जो हीन हो उस को भस्मान्त (मरण पर्यन्त) सूतक लगता है ॥ १० ॥ सूतक कभी न हो और जीने तक सूतक रहे इसप्रकार गुण विशेषसे सूतक दो प्रकारका है ॥११॥ जन्म सूतक में यदि मरण सूतक हो तथा मरण सूतक में जन्म सूतक मिलजाय तो दोनों की शुद्धि मरण सूतक के संग होती है ॥ १२ ॥ सूतक में दान देना, प्रतिग्रह (दान लेना) होम, स्वाध्याय (वेदपाठ) ये सब काम निवृत्त हो जाते हैं। धर्म को जानने वाला ब्राह्मण दश दिनके पीछे सब कर्मों के योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ शास्त्रोक्त विधि से दान देना चाहिये क्योंकि वह दान अशुभ पाप से तारने वाला है। यदि पहिले