अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६ | दक्षस्मृतिः ॥ |
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आपस्नानंगृहस्थस्य व्रतमन्त्रैतपस्विनाम् ॥ १७ ॥
कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्यच ।
प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् ॥ १८ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमो भोजनंबलिकंतथा ।
साङ्गुष्ठंतुसदाकार्यमापतेत्तदधोऽन्यथा ॥ १९ ॥
स्नानादनन्तरंतावदुपस्पर्शनमुच्यते ।
अनेनतुविधानेन स्वाचान्तःशुचितामियात् ॥ २० ॥
उदकएवोदकस्थश्चेत्स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ।
पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः ॥ २१ ॥
प्रक्षाल्यहस्तौपादौच त्रिःपिबेदम्बुवीक्षितम् ।
संहताङ्गुष्ठमूलेन द्विःप्रमृज्यात्ततोमुखम् ॥ २२ ॥
संहत्यतिसृभिःपूर्वमास्यमेवमुपस्पृशेत् ।
अङ्गुष्ठेनप्रदेशिन्या घ्राणंपश्चादुपस्पृशेत् ॥ २३ ॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुःश्रोत्रेपुनःपुनः ।
स्नान, मन्त्रस्नान, तपस्वियों के लिये हैं ॥ १७ ॥ कनिष्ठा, प्रदेशिनी, अंगुष्ठ, इन के मूल में और सब अंगुलियों के अग्रभाग में क्रम से प्रजापति, पितर, ब्रह्म और देवों के तीर्थ माने जाते हैं। इस लिये कनिष्ठा अंगुली के मूल से प्रजापतिको, प्रदेशिनी के मूलसे पितरोंको, अंगुष्ठके मूलसे ब्रह्माको, और हाथ के अग्रभागसे देवोंकेलिये जलदान करे ॥१८॥ दानदेना, दानलेना, भोजन करना, बलि धरना, होम करना, इन कामोंको अंगुष्ठ सहित सब अंगुलियोंसे करे,। अन्यथा करने से अधोगति में पड़ेगा ॥ १९ ॥ स्नानके अनन्तर आचमन करने का विधान कहते हैं ठीक इस के आगे कहे विधान से आचमन करने पर मनुष्य सम्यक् शुद्ध हो जाता है ॥२०॥ जलाशय के भीतर वा स्थल में जहां बैठ कर आचमन करे वहां पग जमाकर आचमन करे, तो बाहर भीतरसे शुद्ध होजाता है।२१। हाथ और पगों को धो कर अंगुलियों से मिलाये हुये अंगुष्ठ के मूल भाग से जल को देख २ कर तीनवार पीवे, फिर अंगुलियों के अग्रभाग में जल लगा २ कर दोवार मुखको शुद्ध करे ॥२२॥ फिर अनामिका, मध्यमा, प्रदेशिनी, इनतीन अंगुलियों से मुखका, अंगुष्ठ और प्रदेशिनी से नासिका के दोनों छिद्रों का,