भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥ ७

नाभिंकनिष्ठाङ्गुष्ठाभ्यां हृदयं तु तलेन वै ॥ २४ ॥
सर्वाभिश्चशिरः पश्चाद्बाहूचाग्रेणसंस्पृशेत् ।
सन्ध्यायांचप्रभातेच मध्यान्हेचततःपुनः ॥ २५ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
वैश्यःप्राशितमात्राभिर्जिह्वागाभिःस्त्रियोऽङ्घ्रिजाः ॥२६॥
योनसन्ध्यामुपासीत ब्राह्मणोहिविशेषतः ।
सजीवन्नेवशूद्रःस्यान्मृतःश्वाचैवजायते ॥ २७ ॥
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हःसर्वकर्मसु ।
यदन्यत्कुरुतेकर्म नतस्यफलभाग्भवेत् ॥ २८ ॥
सन्ध्याकर्मावसानेतु स्वयंहोमोविधीयते ।
स्वयंहोमेफलंयत्तु तदन्येननजायते ॥ २९ ॥
ऋत्विक्पुत्रोगुरुर्भ्राता भागिनेयोऽथविट्पतिः ।
एभिरेवहुतंयत्तु तद्हुतंस्वयमेवतु ॥ ३० ॥


अंगूठा और अनामिका से बारम्बार नेत्र और कानों का, पहिले दहिने नेत्र दहिने कान का पश्चात् वाम का, स्पर्श करे, और अंगूठा और कनिष्ठका से नाभिका, और हाथके तलसे हृदय का स्पर्श करै ॥ २३ । २४ ॥ सब अंगुलियों से शिरका, हाथ के अग्रभाग से दोनों भुजाओं का स्पर्श करे । सायं सन्ध्या के समय, प्रातःकाल और मध्यान्ह में पूर्वोक्त प्रकार से आचमन तथा इन्द्रियस्पर्श करै ॥२५॥ हृदय तक पहुंचने वाले जल के आचमन से ब्राह्मण, कंठ तक पहुंचने वाले से क्षत्रिय, प्राशित ( जो मुख में ही रहै ) मात्र जल से वैश्य, और जिह्वा का स्पर्श जिस से हो, उस जल के आचमन से स्त्री और शूद्र-पवित्र होते हैं ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण विशेष कर संध्योपासन नहीं करता वह जीता ही शूद्र है और मरकर कुत्ता की योनि में जन्म लेता है ॥२७॥ संध्याहीन मनुष्य नित्य अशुद्ध तथा सब कर्मों के अयोग्य है और वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उस के फलका भी भागी नहीं होता है ॥ २८ ॥ संध्यः के पीछे स्वयं होम करना कहा है, क्योंकि जो फल स्वयं होम करने का है, वह अन्य से कराने पर नहीं होता ॥ २९ ॥ ऋत्वज, अध्वर्यु, अपना पुत्र, गुरु, भाई; भानजा, और जामाता इन प्रतिनिधियों द्वारा जो होम कराया गया हो, वह स्वयं किये के तुल्य ही है ॥ ३०॥