भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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८ | दक्षस्मृतिः ॥

देवकार्यंततःकृत्वा गुरुमङ्गलवीक्षणम् ।
देवकार्यस्यसर्वस्य पूर्वाह्नस्तुविधीयते ॥३१॥
देवकार्याणिपूर्वाह्ने मनुष्याणांतुमध्यमे ।
पितॄणामपराह्णेतु कार्याण्येतानियततः ॥३२॥
पौर्वाह्निकंतुयत्कर्म तद्यदासायमाचरेत् ।
नतस्यफलमाप्नोति बन्ध्यास्त्रीमैथुनंयथा ॥३३॥
दिवसस्याद्यभागेतु सर्वमेतद्विधीयते ।
द्वितीयेचैवभागेतु वेदाभ्यासोविधीयते ॥३४॥
वेदाभ्यासोहिविप्राणां परमंतपउच्यते ।
ब्रह्मयज्ञःसविज्ञेयः षडङ्गसहितस्तुयः ॥३५॥
वेदस्वीकरणंपूर्वं विचारोऽभ्यसनंजपः ।
प्रदानंचैवशिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहिपञ्चधा ॥३६॥
समित्पुष्पकुशादीनां सकालःपरिकीर्त्तितः ।
तृतीयेचैवभागेतु पोष्यवर्गान्नसाधनम् ॥३७॥


फिरदेव कार्य करके गुरु और मंगल वस्तु (गौआदि) का दर्शन करे, सब देव कार्य मध्यान्ह से पूर्व ही समय में करना कहा है ॥३१॥ देव कार्य पूर्वाह्न में, मनुष्यों के अतिथि यज्ञादि कार्य मध्य दिन में, पितरों के कार्य मध्यान्ह के पीछे तीसरे पहर में यत्न से करे ॥३२॥ पूर्वाह्न में कर्तव्य कर्म को सायंकाल में जो मनुष्य आलस्यादि से करे, वह उस के फल को इस प्रकार प्राप्त नहीं होता कि जैसे बंध्या स्त्री मैथुन से गर्भ धारण फल को नहीं पाती ॥ ३३ ॥ दिन के पहिले भाग में यह पूर्वोक्त सब कर्त्तव्य कहा और दिन के दूसरेभाग में नियम से वेद का अभ्यास करे ॥ ३४ ॥ नियम से वेद का अभ्यास करना ब्राह्मणों का परम तप कहा है, यदि वेद के छः अंगों ( व्याकरण आदि ) सहित वह वेदाभ्यास किया जाय, तो वही ब्रह्मयज्ञ जानो ॥ ३५ ॥ वेद का अभ्यास पांच प्रकार का है । १-वेद का स्वीकार (गुरुमुख से वेद पढ़ना) २-वेदार्थ का विचार, ३-वेद को बार २ घोषण करना रूप अभ्यास, ४-जप और ५-शिष्यों को पढ़ाना ॥ ३६ ॥ ढांककी समिधा, फूल, कुशा, इन को जहां तहां से लाकर संग्रह भी दिन के द्वितीय भाग में करे । पोष्यवर्ग (पालन के योग्य माता आदि ) के लिये अन्न का प्रबन्ध दिन के तीसरे भाग में करें ॥ ३७ ॥

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