भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१० दक्षस्मृतिः ॥

अदत्तदानाजायन्ते परभाग्योपजीविनः ॥४४॥ यदद्दासि विशिष्टेभ्यो यज्जुहोषि दिनेदिने । यत्तद्वित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षसि ॥४५॥ चतुर्थेऽह्नस्तथाभागे स्नानार्थंमृदमाहरेत् । तिलपुष्पकुशादीनि स्नायाच्चाकृत्रिमेजले ॥४६॥ मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकान्मूषकस्थलात् । अन्तर्जलाच्चमार्गान्ताद् वृक्षमूलात्सुरलयात् ॥४७॥ परशौचावशिष्टाच श्रेयस्कामैः सदाबुधैः । शुचिदेशात्तुसंग्राह्या मृत्तिकास्नानहेतवे ॥४८॥ अश्वक्रान्तेरथक्रान्ते विष्णुकान्तेवसुन्धरे ! । मृत्तिके ! हरमेपापं यन्मयापूर्वसञ्चितम् ॥४९॥ उद्धृतासिवराहेण कृष्णेनशतबाहुना ।

अनाथार्थ, और सज्जन विद्वानों को देवे क्योंकि जिन्हों ने दान नहीं दिया वे पराये भाग्य से जीने वाले पराधीनता के लिये ही पैदा होते हैं ॥ ४४ ॥ जो सज्जनों, विद्वानों, धर्मात्माओं को देता है और जो प्रतिदिन होम करता है उसी को हम तेरा धन मानते हैं, शेष धन तो किसी अन्य का है, जिस की तू रक्षा करता है ॥ ४५ ॥ दिन के चौथे भाग में स्नान के लिये मट्टी लावे तथा तिल, फूल, कुश आदि लावे और ऐसे जल में स्नान करै जो कृत्रिम (बनाये कूप आदि का ) न हो किन्तु स्वयं बहती नदी आदि में स्नान करे ॥ ४६ ॥ कीड़ों के बिलों से, मूषों के घरों से, जल के भीतर से, मार्ग के बीच से, वृक्ष की जड़ से, देव मन्दिर से, और अन्य के हाथ मांजने से बची इन सात स्थानों से अपना कल्याण चाहने वाले विचार शील पुरुष स्नानादि के लिये सदा ही मट्टी न लेवें । किन्तु स्नान के लिये किसी शुद्ध स्थान से मट्टी लेनी चाहिये ॥ ४७ । ४८ ॥ घोड़ा वा रथ जिस पर चलते, विष्णु भगवान् ने अवतार ले २ कर जिसपर आक्रमण-पराक्रम किये दिखाये ऐसी हे पृथिवी ! हे मृत्तिके ! मेरे जो पूर्व संचित पाप हैं, उन को दूर करो ॥४९॥ हे मृत्तिके ! कृष्ण वाराह अवतार धारी शत बाहू भगवान् ने तुम्हारा उद्धार किया है । हे मृत्तिके ! मैं प्रजा और धन के निमित्त तुम को ग्रहण करता हूं । इस