भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥ ५५

अघमर्षणमित्येतद् व्रतंसर्वाघनाशनम् ॥२॥
त्र्यहंसायंत्र्यहंप्रातस्त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहंपरंचनाश्नीयात्प्राजापत्यंचरन्व्रतम् ॥३॥
त्र्यहमुष्णंपिवेत्तोयं त्र्यहमुष्णंघृतंपिवेत् ।
त्र्यहमुष्णंपयःपीत्वा वायुभक्षस्त्र्यहंभवेत् ॥ ४ ॥
तप्तकृच्छ्रं विजानीयाच्छीतैः शीतमुदाहृतम् ।
द्वादशाहोपवासेन पराकःपरिकीर्तितः ॥ ५ ॥
विधिनोदकसिद्धान्नं समश्नीयात्प्रयत्नतः ।
सकृद्वासोदकान्मासं कृच्छ्रंवारुणमुच्यते ॥ ६ ॥
विल्वैरामलकैर्वापि पद्माक्षैरथवाशुभैः ।
मासेनलोकेऽतिकृच्छ्रः कथ्यतेबुद्धिसत्तमैः ॥ ७ ॥
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ॥ ८ ॥
एतैस्तुत्र्यहमभ्यस्तं महासांतपनंस्मृतम् ।

यह तीन दिन का अघमर्षण व्रत सब पापों का नाशक है ॥ २ ॥ जो मनुष्य प्राजापत्य व्रत करे वह तीन दिन तक सायंकाल, तीन दिन तक प्रातःकाल, तीन दिनतक जो विनामांगे मिले उसे खावे और तीनदिन तक सर्वथा भोजन न करे निराहार रहे ॥३॥ तीनदिन तक गर्म जल, तीनदिन गर्म घी, तीनदिन गौकागर्म दूध पीवे और तीन दिन वायु मात्र का भक्षण करे अन्य कुछ न खावे ॥४॥ इस को तप्तकृच्छ कहते और पूर्वोक्त क्रमसे यदि शीतल जल आदि पीवे तो शीत कृच्छ कहा जायगा । और बारह दिनके उपवास से शुद्ध पराक कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ ५ ॥ विधि पूर्वक जल से बनाये अन्न को बड़े यत्न से जो खावे यदि वह मनुष्य एक महीने तक सोदक करे अर्थात् भोजन के बिना अन्न न पीवे उसे वारुण कृच्छ्र कहते हैं ॥ ६ ॥ बेल, आंवले, अच्छे कमलगट्टे, इन को एक महीने खाने से बुद्धिमानों ने अतिकृच्छ्र कहा है ॥ ७ ॥ गोमूत्र गोबर, दूध, दही, घी, कुशा का जल इन सब को एक दिन खाना और एक दिन का उपवास करना इस को सांतपन कृच्छ्र कहते हैं ॥ ८ ॥ तीन दिन तक इन के करने से महासांतपन कहाता है । तिलों का खल बिना जल का मठा.