भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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५४ शंखस्मृतिः ॥

वर्णानांयद्व्रतंप्रोक्तं तद्व्रतंप्रयतःचरेत् ॥ ६१ ॥
कृत्वापापंनगूहेत गूह्यमानंविवर्द्धते ।
कृत्वापापंबुधःकुर्यात् पर्षदोऽनुमतंव्रतम् ॥६२॥
तस्करश्वापदाकीर्णे बहुव्यालमृगेवने ।
नव्रतंब्राह्मणःकुर्यात् प्राणव्याधाभयात्सदा ॥६३॥
सर्वत्रजीवनंरक्षेज्जीवन्पापमपोहति ।
व्रतैःकृच्छ्रैश्चदानैश्च इत्याहभगवान्यमः ॥६४॥
शरीरंधर्मसर्वस्वं रक्षणीयं प्रयत्नतः ।
शरीरात्स्रवतेधर्मः पर्वतात्सलिलंयथा ॥६५॥
आलोच्यधर्मशास्त्राणि समेत्यब्राह्मणैःसह ।
प्रायश्चित्तंद्विजोदद्यात् स्वेच्छयानकदाचन ॥६६॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
त्र्यहं त्रिषवणस्नायी स्नानेस्नानेऽघमर्षणम् ।
निमग्नस्त्रिःपठेद्प्सु नभुञ्जीतदिनत्रम् ॥१॥
वीरासनंचतिष्ठेत गांदद्याच्चपयस्विनीम् ।


वाला. ब्राह्मणादि वर्णों को जो २ व्रत कहा है उसी को मन लगाके करे ॥६१॥ पाप को करके न छिपावे क्योंकि छिपाने से पाप बढ़ता है। इस कारण पाप को करके ज्ञानवान् पुरुष धर्मसभा की अनुमति से व्रत करे ॥ ६२ ॥ चोर, भड़िया, सांप मृग ये जिस में हों ऐसे वन में ब्राह्मण प्राणों के भय से सदैव व्रत न करे ॥ ६३ ॥ क्योंकि जीवन की रक्षा सब जगह करनी चाहिये जीवित रहता हुआ मनुष्य कृच्छ्र प्राजापत्यादि व्रतों तथा दानों के द्वारा पाप को दूर कर सकता है यह बात भगवान् धर्मशास्त्रकर्त्ता यम ने कही है ॥६४॥ धर्म का सर्वस्व जो शरीर है उस की प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिये। शरीर से धर्म इस प्रकार निकलता है जैसे पर्वत में से जल के झरने निकलते हैं ॥६५॥ इस से ब्राह्मणों के संग मिल के धर्मशास्त्रों को देख विचार कर विद्वान् ब्राह्मण अपराधी को प्रायश्चित्त बतावे किन्तु अपनी इच्छा से कभी न बतावे ॥६६॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

तीन दिन तक त्रिकाल स्नान करे और तीनों स्नानों में जल में डूबा हुआ तीन २ वार अघमर्षण सूक्त जपे और तीन दिन तक भोजन न करे निराहार व्रत करे ॥१॥ वीरासन से बैठा रहे और दूध देती गौ का दान करे