अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ शंखस्मृतिः ॥
पिण्याकंवामतक्रांबुसक्तूनांप्रतिवासरम् ॥ ९ ॥ उपवासान्तराभ्यामात्तुलारुरुषउच्यते । गोपुरीषाशनोभूत्वा मासंनित्यंसमाहितः ॥ १० ॥ व्रतंतुयावकंकुर्यात्सर्वपापापनुत्तये । ग्रासंचन्द्रकलावृद्ध्या प्राश्नीयाद्वर्द्धयन्सदा ॥ ११ ॥ ह्रासयेच्चकलावृद्ध्या व्रतंचान्द्रायणंचरन् । मुण्डस्त्रिपवणस्नायी अधःशायोजितेन्द्रियः ॥ १२ ॥ स्त्रीशूद्रपतितानांच वर्जयेत्परिभाषणम् । पवित्राणिजपेच्छक्त्या जुहुयाच्चैवशक्तिः ॥ १३ ॥ अयंविधिःसविज्ञेयः सर्वकृच्छ्रेषुसर्वदा । पापात्मानस्तुपापेभ्यः कृच्छ्रैःसंतारितानराः ॥ १४ ॥ गतपापादिवंयान्ति नात्रकार्याविचारणा । शंखप्रोक्तमिदंशास्त्रं योऽधीतेबुद्धिमान्नरः ॥ १५ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तस्स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १६ ॥ इतिशांखेधर्मशास्त्रेअष्टादशोऽध्यायः॥१८॥इतिशंखस्मृतिःसमाप्ता॥
सत्तू इन के प्रतिदिन ॥९॥ बीच २ में उपवास करके अभ्यास (करना) से तुला- पुरुष व्रत कहा है । गोवर को एक महीने तक प्रतिदिन सावधानी से खाकर ॥१०॥ सब पापों के नाश के लिये इस यावक व्रत को करे । चन्द्रमा की कला की वृद्धि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन बढ़ाकर खावे ॥११॥ और कला की हानि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन वह पुरुष घटावे जो चान्द्रायण व्रत करे । मुंडन किये हुये त्रिकाल स्नान करे भूमि पर सोवेइन्द्रियों को जीते ॥१२॥ स्त्री, शूद्र, पतित नीच इनके संग न बोले पवित्रता के मन्त्र स्तोत्र आदि को जपे और यथा शक्ति होम करे ॥ १३ ॥ यह विधान सब कृच्छ्रों में सदैव जानो । कृच्छ्रों के प्रताप से पापों से छूटे पापी पुरुष ॥१४॥ नष्ट हुआ है पाप जिन का ऐसे होकर स्वर्ग में जाते हैं इस में कुछ सन्देह नहीं है। शंख ऋषि के कहे इस शास्त्र को जो बुद्धिमान् नर पढ़ता है ॥ १५ ॥ वह सब पापों से पृथक् होकर स्वर्गलोक में पूजता है ॥१६॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में अठारहवां अध्याय पूरा हुआ और यह ग्रन्थ भी समाप्त हुआ ॥