अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथलिखितस्मृतिप्रारम्भः॥
इष्टापूर्त्तेतुकर्तव्ये ब्राह्मणेनप्रयत्नतः।
इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तमौक्षमवाप्नुयात् ॥ १ ॥
एकाहमपिकर्त्तव्यं भूमिष्ठमुदकंशुभम् ।
कुलानितारयेत्सप्त यत्रगौर्वितृषाभवन् ॥ २ ॥
भूमिदानेनयेलोका गोदानेनचकीर्त्तिताः।
तांल्लोकान्प्राप्नुयान्मर्त्यः पादपानांप्ररोपणे ॥ ३ ॥
वापीकूपतड़ागानि देवतायतनानिच ।
पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ४ ॥
अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच इष्टमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥
इष्टापूर्त्तेद्विजातीनां सामान्योधर्मउच्यते।
ब्राह्मण प्रयत्न से इष्ट ( श्रौत अग्निहोत्रादि ) और पूर्त ( कूप बन वाना प्याऊ बैठाना आदि ) धर्म के कामों को बड़े यत्न से करै क्योंकि इष्ट से स्वर्ग मिलता और पूर्त से मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जिसमे एक गौ की प्यास निवृत्त होजाय इतना जल यदि एक दिन भी पृथिवी में जो करदे, वह सात कुलों को तारता है ॥ २ ॥ भूमि और गौ के दान से जिन लोकों के भोग मिलते हैं उन्हीं लोकों को वृक्षों के लगाने से मनुष्य प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ बावड़ी, कुआ, तालाब, और देवताओं के मन्दिर, इन में जो २ टूटे फूटे पुराने हो गये हों, उन की जो ठीक २ मरम्मत करै, वह भी पूर्त कर्मों के फल को भोगता है ॥ ४ ॥ अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदों की रक्षा, अभ्यागत का सत्कार और वैश्वदेव, इन सब को इष्ट कहते हैं ॥ ५ ॥ द्विजातियों के इष्ट और पूर्त ( वापी कूप तालाब देव मन्दिरादि का बनवाना ) साधारण धर्म