अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२ लिखितस्मृतिः ॥
अधिकारोभवेच्छूद्रः पूर्त्तेधर्मेनवैदिके ॥ ६ ॥ यावदस्थिमनुष्यस्य गंगातोयेषुतिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७ ॥ देवतानांपितॄणांच जलेद्याज्जलाञ्जलिम् । असंस्कृतमृतानांच स्थलेद्याज्जलाञ्जलिम् ॥ ८ ॥ एकादशाहेप्रेतस्य यस्यचोत्सृजतेवृषः । मुच्यतेप्रेतलोकात्तु पितृलोकंसगच्छति ॥ ९ ॥ एष्टव्याबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् । यजेतवाश्वमेधेन नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ १० ॥ वाराणस्यांप्रविष्टस्तु कदाचिन्निनिक्रमेद्यदि । हसन्तिस्तस्यभूतानि अन्योन्यंकरताडनैः ॥ ११ ॥ गयाशिरेतुयत्किंचिन्नाम्नापिण्डन्तुनिर्वपेत् । नरकस्थोदिवंयाति स्वर्गस्थोमोक्षमाप्नुयात् ॥ १२ ॥ आत्मनोवापरस्यापि गयाक्षेत्रेयतस्ततः ।
कहे हैं । शूद्र मनुष्य पूर्त धर्म का अधिकारी है वेदोक्त इष्ट धर्म का नहीं ॥६॥
मनुष्य की हड्डी जब तक गंगा जल में पड़ी रहती है उतने ही हजार वर्ष तक
वह स्वर्ग लोक में पूजता है ॥ ७ ॥ देवता और पितरों को जलाशय में, और
संस्कार से पहिले जो मरे हों, उन को स्थल में तर्पण के समय जल की अंजली
देवे ॥ ८ ॥ जिस मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग होता है वह प्रेत
योनि से छूट कर पितृलोक में जाता है ॥९॥ बहुत से पुत्रों की इच्छा करनी
चाहिये, यदि उन में से एक भी गया को जाय, वा अश्वमेध यज्ञ करे, अथवा
नील बैल का उत्सर्ग करे, वही पुत्र पिता को तारने वाला होता है ॥ १० ॥
कोई मनुष्य काशी में जाकर यदि कदाचित् वहां से निकल आता है तो
उस को सब भूत आपस में ताली देकर हंसते हैं ॥ ११ ॥ गया में जाकर जिस
किसी के नाम से पिण्ड दान करै, यदि वह नरक में हो तो स्वर्ग में जाता
और स्वर्ग में हो तो मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ अपने कुल के वा अन्य इष्ट
मित्र सम्बन्धी आदि जिस किसी के नाम से गया में पिण्ड देवे, वह पिण्डदान