अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३
यन्नाम्नापातयेत्पिण्डं तंनयेद्ब्रह्मशाश्वतम् ॥ १३ ॥
लोहितोयस्तुवर्णेन शंखवर्णखुरस्तथा ।
लाङ्गूलशिरसोश्चैव संवनीलवृषःस्मृतः ॥ १४ ॥
नवश्राद्धंन्त्रिपक्षेच द्वादशस्वेवमासिकम् ।
षण्मासेचाब्दिकंचैव श्राद्धान्येतानिषोडश ॥ १५ ॥
यस्यैतानिनकुर्वीत एकोद्दिष्टानिषोडश ।
पिशाचत्वंस्थिरन्तस्य दत्तैःश्राद्धशतैरपि ॥ १६ ॥
सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रतिसंवत्सरंद्विजः ।
मातापित्रोःपृथक्कूर्यादेकोद्दिष्टंमृतेऽहनि ॥ १७ ॥
वर्षेवर्षेतुकर्तव्यं मातापित्रोस्तुसन्ततम् ।
अदैवंभाजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकन्तुनिर्वपेत् ॥ १८ ॥
संक्रान्तावुपरागेच पर्वण्यपिमहालये ।
निर्व्वाप्यास्तुत्रयःपिण्डा एकत्रस्तुक्षयेऽहनि ॥ १९ ॥
एकोद्दिष्टंपरित्यज्य पार्व्वणंकुरुतेद्विजः ।
अकृतन्तद्विजानीयात् समातापितृघातकः ॥ २० ॥
अमावास्याक्षयोयस्य प्रेतपक्षेऽथवायदि ।
उस को सनातन ब्रह्म को पहुंचाता है ॥ १३ ॥ जिस का रंग लाल हो खुर पूंछ, शिर ये सफेद हों, उसे नील बैल कहते हैं ॥ १४॥ एक ग्यारहवें दिन का नवक श्राद्ध,–द्वितीय १॥ महीने में, बारह महीनों के बारह, छठे महिने की पूर्त्ति के दिन १ और एक वर्षी ये सोलह एकोद्दिष्ट श्राद्ध हैं ॥ १५ ॥ जिस के ये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हों, उस को सैकड़ो श्राद्ध देने पर भी प्रेत योनि नहीं छूटती है ॥ १६ ॥ सपिण्डी श्राद्ध किये पीछे प्रति वर्ष माता पिता के मरने के दिन में पृथक् २ एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया करे ॥ १७ ॥ माता पिता का श्राद्ध वर्ष २ में निरन्तर करे और विश्वेदेवा को छोड़ के श्राद्ध में ब्राह्मण जिमावे और एक पिण्ड देवे ॥ १८ ॥ संक्रान्ति, ग्रहण, पर्व्वदिन (अमावास्या) महालय (कनागत) इन में पितृपक्ष में तीन पिण्ड और मातृ पक्ष में तीन पिण्ड देवे और पिता माता के मरने के दिन ॥ १९ ॥ एकाद्दिष्ट को छोड़ कर पार्व्वण श्राद्ध करता है, उस श्राद्ध को नहीं किया जानो क्योंकि वह पुत्र माता पिता का मारने वाला है ॥ २० ॥ जो अमावास्या को