भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५२ | शंखस्मृतिः ॥

लोहितान्वृक्षनिर्यासान्व्रश्चनप्रभवांस्तथा ॥ ३१ ॥
केवलानिचशुक्तानि तथापर्युषितंचयत् ।
गुडशुक्तंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रंचव्रतीभवेत् ॥ ३२ ॥
दधिभक्ष्यंचशुक्तेषु यच्चान्यद्दधिसंभवम् ।
गुडशुक्तंतुभक्ष्यंस्यात् ससर्पिष्कमितिस्थितिः ॥ ३३ ॥
यवगोधूमजाःसर्वे विकाराःपयसश्चये ।
राजवाड्वकुल्यंच भक्ष्यंपर्युषितंभवेत् ॥ ३४ ॥
सजीवपक्वंमांसंच सर्वयत्नेनवर्जयेत् ।
संवत्सरंव्रतंकुर्यात् प्राश्यैतानज्ञानतस्तुतान् ॥ ३५ ॥
शूद्रान्नंब्राह्मणोभुक्त्वा तथारङ्गावतारिणः ।
चिकित्सकस्यक्षुद्रस्य तथास्त्रीमृगजीविनः ॥ ३६ ॥
षण्डस्यकुलटायाश्च तथाबन्धनचारिणः ।
वद्धस्यचैवचौरस्य अवीरायाःस्त्रियस्तथा ॥ ३७ ॥
चर्मकारस्यवेनस्य क्लीवस्यपतितस्यच ।
रुक्मकारस्यधूर्त्तस्य तथावार्द्धुपिकस्यच ॥ ३८ ॥
कदर्यस्यनृशंसस्य वेश्यायाःकितवस्यच ।


गोंदने से निकलेहों ॥३१॥ केवल शुक्त (खटाये हुए) और वासी पदार्थ, खटाया बिगड़ा हुआ गुड़ का विकार इन को खाकर तीन दिन व्रत करे ॥ ३२ ॥ विकार से खटाये हुए पदार्थों में दही, तथा दही से बने कढ़ी, रायतादि, घी जिस में मिला हो ऐसा खटाया गुड़ ये शुक्तों में भक्ष्य कहे हैं ॥ ३३ ॥ जौ, गेहूं, दूध,-इन से बने सब विकार और राजवाड़व नामक जीव का मांस ये वासी (धरे हुए) भी भक्ष्य हैं ॥३४॥ जीते जीवों के पकाये मांस को सब प्रकार त्याग देवे और इन पूर्वोक्त अभक्ष्य पदार्थों को ज्ञान पूर्वक खावे तो एक वर्ष तक व्रत करे ॥३५॥ शूद्र, रंगावतारी (नाटकी) वैद्य, क्षुद्रबुद्धि, स्त्री को नचा के तथा मृगों को मार के जीविका करने वाला ॥३६॥ नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, बन्धन चारी, (डाकिये) कैदी चोर, पति पुत्र हीन स्त्री, ॥ ३७ ॥ चमार, वेन, क्लीव, (नामर्द) पतित, सुनार, धूर्त्त नाम अन्य की हानि करने वाला, व्याज लेने वाला, ॥ ३८ ॥ कंजूस, हिंसक, वेश्या, जुवारी, इन शूद्रादि