अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १३
दद्याच्चशर्कराधेनुं भोजयेच्चशतंद्विजान् ॥ ४६ ॥
राजहाक्षयरोगीस्यादेपातस्यचनिष्कृतिः ।
गोभूहिरण्यमिष्टान्नजलवस्त्रप्रदानतः ॥ ४७ ॥
घृतधेनुप्रदानेन तिलधेनुप्रदानतः ।
इत्यादिनाक्रमेणैव क्षयरोगःप्रशाम्यति ॥ ४८ ॥
रक्तार्बुदोवैश्यहन्ता जायतेसचमानवः ।
प्राजापत्यानिचत्वारि सप्तधान्यानिचोत्सृजेत् ॥ ४९ ॥
दण्डापतानकयुतः शूद्रहन्ताभवेन्नरः ।
प्राजापत्यंसकृच्चैव दद्याद्धेनुंतदक्षिणाम् ॥ ५० ॥
कारूणांचवधेचैव रूक्षभावःप्रजायते ।
तेनतत्पापशुद्ध्यर्थं दातव्योवृषभःसितः ॥ ५१ ॥
सर्वकार्येष्वसिद्धार्थो गजघातीभवेन्नरः ।
प्रासादंकारयित्वानु गणेशंप्रतिमांन्यसेत् ॥ ५२ ॥
अथवागणनाथस्य मन्त्रंलक्षमितंजपेत् ।
बनाकर दान करे और १०० ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥४६॥ राजहत्या करने वाला क्षयी रोगयुक्त होता, उस का प्रायश्चित्त यह है कि गौ, भूमि, सुवर्ण, मिष्टान्न, (लड्डूआदि) जल, और वस्त्रों के दान से ॥ ४७ ॥ घी की धेनु और तिलों की गौ बनाकर देने से इत्यादि क्रम से दान करने पर क्षयी रोग शान्त होजाता है ॥ ४८ ॥ वैश्य को मारनेवाला नरकान्त में रक्तार्बुद रोगी होता है वह चार प्राजापत्य व्रत करके सप्तधान्य (सतनजा) का दान करे ॥ ४९ ॥ शूद्र हत्या करनेवाला जन्मान्तर में दण्डाप्तानक रोगयुक्त होता, वह एक प्राजापत्य व्रत करके एक गो दक्षिणा देवे ॥ ५० ॥ कारीगरों का वध करनेपर शरीर में रूखापन होता है उस अपराधी को अपने उस पाप की शुद्धि के लिये श्वेत बैल का दान करना चाहिये ॥५१॥ हाथी की हत्या करने वाला जो कुछ काम करता है वही सिद्ध नहीं होता सभी निष्फल जाते हैं। वह एक ऊंचा मन्दिर बनवाकर गणेशजी की प्रतिमा की स्थापना करावे ॥५२॥ अथवा गणेश जी के मन्त्र का एक लक्ष जप करे वा करावे और सब देवतों की शान्तिपूर्वक धूपों
३