अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ शातातपस्मृतिः ॥
एकादशस्वर्णनिष्काः प्रदातव्यान्नदक्षिणाः ॥ ३६ ॥
पलान्येकादशतथा दद्याद्वित्तानुसारतः ।
अन्येभ्योऽपियथाशक्ति द्विजेभ्योदक्षिणांदिशेत् ॥४०॥
स्नापयेद्दम्पतॊपञ्चान्मन्त्रैर्वरुणदैवतैः ।
आचार्यायप्रदेयानि वस्त्रालङ्करणानिच ॥ ४१ ॥
गोत्रहापुरुषःकुष्ठो निर्वंशश्चोपजायते ।
सचपापविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यशतंचरेत् ॥ ४२ ॥
व्रतान्तेमेदिनींदत्त्वा शृणुयादथभारतम् ।
स्त्रीहन्ताचातिसारीस्यादश्वत्थान्रोपयेद्दश ॥ ४३ ॥
विप्रस्यबालकंहत्वा संहृतरत्नकाञ्चनम् ।
तेनैवजायतेमृत्युः पुत्राणांचपुनःपुनः ॥ ४४ ॥
तादृक्कर्म्मविनाशाय कार्यंतेनैवयततः ।
वृषोहैमेनसंयुक्तो दातव्योवस्त्रसंयुतः ॥ ४५ ॥
अतिरुद्र का दशांश होम करे और पूर्वोक्त घी की आहुतियों से भी होम करे तथा ग्यारह तोला सुवर्ण दक्षिणा में देवे ॥ ३९ ॥ यदि श्रीमान् हो तो ४४ चवालीश तोला सुवर्ण दक्षिणा देवे । जप पाठ करनेवालों से भिन्न सुपात्र ब्राह्मणों को भी यथाशक्ति दक्षिणा देवे ॥ ४० ॥ पश्चात् कुशका पुरोहित वरुण देवतावाले मन्त्रों से यजमान और पत्नी को स्नान करावे । तथा प्रायश्चित्त कर्त्ता अपने आचार्यों को वस्त्र और आभूषण देवे ॥४१॥ अपने गोत्री पुरुष की हत्या करनेवाला पुरुष नरकान्त में कुष्ठी और निर्वंश होता है । वह पाप से शुद्ध होने के लिये सौ प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४२॥ फिर व्रत के अन्त में पृथिवी का दान देकर श्रद्धा से महाभारत का श्रवण करे । स्त्री हत्यारा अतीसार का रोगी होता है वह पीपल के दश वृक्षों को लगावे ॥ ४३ ॥ ब्राह्मण के बालक को मार डाले और उसके सुवर्ण रत्नादि आभूषण लेलेवे तो नरकान्त में होने वाले मनुष्य जन्मों में वार २ उत्पन्न हो २ कर उसके पुत्र मरते हैं कोई जीवित नहीं रहता ॥ ४४ ॥ उस पाप के नाशार्थ उस पापी को यत्न के साथ सुवर्ण तथा वस्त्रों से युक्त बैल का दान करना चाहिये ॥ ४५ ॥ शङ्कर की गौ