अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 656, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१० शातातपस्मृतिः ॥
हत्वावैबालकंसुप्तं स्वसृजातं चमूलजम् ।
तेनसंजायतेबन्ध्या मृतवत्साचनारकी ॥ २६ ॥
तत्पातकविनाशाय यथाकार्यंप्रयत्नतः ।
सौवर्णंबालकंकृत्वा दद्याद्दोलासमान्वितम् ॥ २७ ॥
अनड्वाहंततोदद्याद् वस्त्रद्वयसमन्वितम् ।
तत्पातकविनिर्मुक्ता पश्चाद्भवतिपुत्रिणी ॥ २८ ॥
पिताबन्दीकृतोयेन निबद्धोलोहशृङ्खलैः ।
चिरंकष्टतरंभुक्त्वा मृतस्तत्रैवमन्दिरे ॥ २९ ॥
तेनपापेनपापात्मा पतितोरौरवार्णवे ।
नरकान्तेभवेच्चिन्हं पङ्गुर्मूकोविचेतनः ॥ ३० ॥
तस्यपापविनिर्मुक्त्यै पिताकार्योहिरण्मयः ।
पितरंरथमारूढं विप्रायप्रतिपादयेत् ॥ ३१ ॥
स्वसृघातीतुबधिरो नरकान्तेप्रजायते ।
बहनाई के द्वारा भगिनी से उत्पन्न हुए अपने सोवे हुए भागिनेय (भानेज) बालक को जो मारडाले वह नरक भोग के बाद बन्ध्या स्त्री अथवा जो सन्तान हों वे मरजावें ऐसी होती है ॥ २६ ॥ उस पातक के विनाशार्थ जो प्रायश्चित्त यत्न पूर्वक करना चाहिये सो कहते हैं। एक सुवर्ण का बालक बनाके हिंडोले सहित दान करे ॥ २७ ॥ फिर दो वस्त्रों सहित एक बैल का दान करे । इस प्रायश्चित्त से उस पातक से मुक्त हुई पुत्रवती होजाती है ॥ २८ ॥ जिस पुरुष ने अपने पिता को लोहे की सांकरों से बांधकर कैद किया हो और वह बहुत काल तक अत्यन्त कष्ट भोग कर उसी हवालात में मरगया हो ॥ २९ ॥ वह पापी पुत्र उस महापाप से रौरव नरक में पड़ता है फिर नरक भोग के अन्त में मनुष्य जन्म होने पर लंगड़ा, मूक (गूंगा) तथा मूढता के चिन्ह युक्त होता है ॥ ३० ॥ उस पापसे छूटने के लिये वह अपने पिता की सुवर्ण की प्रतिमा बनवा कर और रथ में बैठा कर रथ सहित पिता की प्रतिमा को सुपात्र ब्राह्मण को दान कर देवे ॥ ३१ ॥ भगिनी को मारडालने वाला नरक भोगने पश्चात् मनुष्य जन्म होने पर बधिर होता है और भाई का वध करने पर