भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 805 में से

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कुर्यादन्यन्नवाकुर्यान् मैत्रोब्राह्मणउच्यते ॥ २८ ॥
उपांशुःस्याच्छतगुणः साहस्त्रोमानसःस्मृतः ।
नोच्चैर्जपंबुधःकुर्यात्सावित्र्यास्तुविशेषतः ॥ २९ ॥
सावित्रीजप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोतिमानवः ।
गायत्रीजाप्यनिरतो मोक्षोपायंचविन्दति ॥ ३० ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नातःप्रयतमानसः ।
गायत्रींतुजपेद्भक्त्या सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

स्नातःकृतजप्यस्तदनु प्राङ्मुखो दिव्येन तीर्थेन देवानु-
दकेन तर्पयेत् ॥ १ ॥ अथ तर्पणविधिः॥२॥ ओं० भगवन्तं
शेषं तर्पयामि ॥ ३ ॥ कालाग्निरुद्रंतुततो रुक्मभौमंतथैवच ।
श्वेतभौमंततःप्रोक्तं पातालानांचसप्तकम् ॥ ४ ॥
जम्बूद्वीपं ततःप्रोक्तं शाकद्वीपंततःपरम् ।
गोमेदपुष्करंतद्वच्छाकाख्यंचततःपरम् ॥ ५ ॥

करे वा न करे तो भी उस को मित्र कहते हैं ॥ २८ ॥ वाणी से साफ २ बोलने की अपेक्षा उपांशु (मन्द) जप सौगुणा और मानस (मन २ में) जप करना हजार गुणा अधिक फल दायक कहा है । ज्ञानवान् मनुष्य ऊंचे स्वर से जप न करे और गायत्रीका जप तो ऊंचे स्वर से विशेष कर कदापि न करे ॥२९॥ गायत्री के जप में तत्पर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता और गायत्री के जपमें तत्पर मनुष्य मोक्ष के उपाय को भी प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ तिससे सब प्रयत्न से स्नान के पीछे मन को रोक कर भक्ति से सब पापों के नाश करने वाली गायत्री को जपे ॥ ३१ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

स्नान और सन्ध्योपासन जप करके पूर्वाभिमुख बैठा पुरुष देवतीर्थ से देवताओं का जल से तर्पण करे ॥ १ ॥ अब तर्पणविधि कहते हैं ॥ २ ॥ ओं भगवान् शेषको तृप्त करता हूं ॥ ३ ॥ फिर कालाग्निरुद्र, रुक्मभौम, श्वेतभौम, सातों पाताल सब को क्रम से तृप्त करें अर्थात् (अतलं तर्पयामि) इत्यादि रीति से पृथक् २ सबका तर्पण करे ॥ ४ ॥ फिर जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, गोमेद, पुष्कर, और शाक, इन को पृथक् २ जलदान से तृप्त करे ॥ ५ ॥

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