अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ | संस्कारविधिः ॥
शार्व्वरं ततः स्वधामानं ततो हिरण्यरोगणं ततः कल्पस्थायिनो लोकांस्तर्पयेत् ॥ ६ ॥ लवणोदकं ततः क्षीरोदं ततो घृतोदं तत इक्षुदं ततः स्वादूदं तत इति सप्त समुद्रकं प्रत्यृचं पुरुषसूक्तेनोदकाञ्जलीन् दद्यात्, पुष्पाणि च तथा भक्त्या॥७॥ अथ कृतापसव्यो दक्षिणामुखोऽन्तर्जानुः पित्र्येण पितॄणां यथाश्रद्धं प्रकाममुदकं दद्यात् ॥ ८ ॥ सौवर्णेन पात्रेण राजतेनौदुम्बरेण खड्गपात्रेणान्यपात्रेण वोदकं पितृतीर्थं स्पृशन्दद्यात् ॥९॥ पित्रे पितामहाय प्रपितामहाय मात्रे पितामह्यै प्रपितामह्यै मातामहाय प्रमातामहाय वृद्धप्रमातामहाय मातामह्यै प्रमातामह्यै वृद्धप्रमातामह्यै सप्रभान्पुरुषान् पितृपक्षे यावतां नाम जानीयात् पितृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा गुरूणां मातृपक्षाणां तर्पणं कुर्यात् ॥१०॥ मातृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा सम्बन्धिबान्धवानां कुर्यात् तेषां कृत्वा सुहृदां कुर्यात् ॥ ११ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः ॥ १२ ॥
फिर शार्वर, स्वधामा, हिरण्यरोमा, कल्पतक ठहरने वाले लोक, इन सबको तृप्त कर देवे। फिर लवणोद, क्षीरोद, घृतोद, इक्षुद, इन सात समुद्रों को तृप्त करे । फिर परमेश्वर की पुरुष सूक्त (सहस्रशीर्षा०) के प्रत्येक मन्त्रसे जलकी अञ्जली देवे और अञ्जलि के साथ भक्ति से पुष्पों को समर्पण करे ॥ ७ ॥ फिर अपसव्य हो कर दक्षिण को मुख किये और गोड़ेके भीतर हाथ करके पितृतीर्थ से उत्तम श्रद्धाके साथ यथेष्ट जल पितरों को देवे ॥ ८ ॥ सुवर्ण, चांदी, गूलर, गैंडा, इन सुवर्णादि के पात्रों से अथवा किसी अन्य तांबादिके पात्र से पितृ तीर्थ का स्पर्श करते हुए जलको देवे ॥ ९ ॥ पिता, पितामह, (दादा) प्रपितामह (पड़दादा) माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, (नाना) प्रमातामह, (पड़नाना) वृद्धप्रमातामह, मातामही (नानी) प्रमातामही, (पड़नानी) वृद्धप्रमातामही, सात पीढ़ी तक पिता के पक्ष में जितनों का नाम जानता हो, पितृपक्ष वालोंका तर्पण करके, गुरु और मातृपक्षवालों का तर्पण करे ॥ १० ॥ और मातृपक्षवालों का तर्पण करके अन्य सम्बन्धि तथा बान्धवोंका तर्पण करे ॥ ११ ॥ इस तर्पणके विषयमें श्लोक भी प्रमाण हैं ॥१२॥