अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
विनारौप्यसुवर्णेन विनाताम्रेणतिलेन च । विनादर्भैश्चमन्त्रैश्च पितॄणांनोपतिष्ठते ॥ १३ ॥ सौवर्णराजताभ्यांच खङ्गेनौदुम्बरेणच । दत्तमक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १४ ॥ हेम्नातुराहतंयुक्तं क्षीरेणमधुनासह । तदप्यक्षयतांयाति पितॄणांतुतिलोदकम् ॥ १५ ॥ कुर्यादहरहःश्राद्धमन्नाद्येनोदकेनवा । पयोमूलफलैर्वापि पितॄणांप्रीतिमावहन् ॥ १६ ॥ स्नातःसंतर्पणंकृत्वा पितॄणांतुतिलाम्भसा । पितृयज्ञमवाप्नोति प्रीणातिचपितॄंस्तथा ॥ १७ ॥ इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
ब्राह्मणान्नपरीक्षेत दैवेकर्मणिधर्मवित् । पित्र्येकर्मणिसंप्राप्ते युक्तमाहुःपरीक्षणम् ॥ १ ॥ ब्राह्मणाश्चैविविकर्मस्था वैडालव्रतिकारतथा ।
चांदी, सोना, तांबा, तिल, कुश, और मन्त्र, इन के बिना दिया हो जल वह पितरों को प्राप्त नहीं होता ॥ १३ ॥ सोना, चांदी, गेंडा, गूलर, इन के पात्रों में, पितरों को दिया जल प्रदाय अविनाशी फल दायक होता है ॥१४॥ सोना, दूध, मदन, इन के साथ जो तिल सहित जल पितरों को दिया जाता है, वह भी अक्षय फलदायी है ॥१५॥ पितरों की श्रद्धा प्रीति प्रकट करता हुआ अन्न आदि, जल, दूध मूल, अथवा फलों से पितरों का प्रति दिन श्राद्ध करे ॥ १६ ॥ स्नान के पीछे तिल सहित जल में पितरों का तर्पण करने से पितृयज्ञ पूरा हो जाता है और पितर भी तृप्त हो जाते हैं ॥ १७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
धर्म का मर्म ज्ञाता पुरुष देवताओं के निमित्त किये दान पुण्यादि कर्म में ब्राह्मणों की परीक्षा न करे और पितरों के निमित्त श्राद्धादि कर्म हो तो परीक्षा करना आवश्यक कहा है ॥१॥ जो ब्राह्मण निषिद्ध कर्म को करते हैं अथवा बैडालव्रत (निर्दयी चित्त वाले) हैं, या जिन के देह के अंगुली आदि
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