भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 805 में से

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४ शंखस्मृतिः ॥

सावित्रोपत्तिताव्रात्याः सर्वधर्मबहिष्कृताः ॥ ६ ॥
मौञ्जीज्याश्मन्तनानांतु क्रमान्मौञ्ज्यःप्रकीर्तिताः ।
मार्गवैयाघ्रवास्तानि चर्माणिब्रह्मचारिणाम् ॥ १० ॥
पर्णीपिप्पलविल्वानां क्रमाद्दण्डाःप्रकीर्तिताः ।
केशदेशललाटास्य तुल्याःप्रोक्ताःक्रमेणतु ॥ ११ ॥
अवक्रास्सत्वचस्सर्वे नाग्निदग्धास्तथैवच ।
वस्त्रोपवीतेकार्पासक्षौमोर्णानांयथाक्रमम् ॥ १२ ॥
आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षितम् ।
भैक्षस्याचरणंप्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥ १३ ॥
इति श्रीशाङ्खेधर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
उपनीयगुरुःशिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यंच संध्योपासनमेवच ॥ १ ॥


बहिष्कृत [ अनाधिकारी ] व्रात्य हो जाते हैं अर्थात् शूद्र वत् हो जाते हैं॥९॥ मूंज, मूर्वा (तृणविशेष) और शण इन की क्रम से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों की मेखला (कंधनी) और मृग व्याघ्र बकरा इन के चर्म तीनों ब्रह्मचारियों के लिये क्रम से कहे हैं ॥ १० ॥ ढांक पीपल बेल इन वृक्षों के दण्ड तीनों वर्णों के लिये क्रम से कहे हैं । केशों तक ब्राह्मण का, माथे तक क्षत्रिय का और मुख तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड रहे ॥ ११ ॥ वे दण्ड टेढ़े न हों त्वचा [ वक्कल ] सहित हों; तथा अग्नि से जले न हों । ब्राह्मण के वस्त्र तथा जनेऊ कपास के, क्षत्रिय के अतसी के और वैश्य के ऊन के होने चाहिये ॥ १२ ॥ भिक्षा मांगने के समय ब्राह्मण ब्रह्मचारी ( भवति भिक्षां देहि ) ऐसा वाक्य कहे । क्षत्रिय ( भिक्षां भवति देहि ) ऐसा कहे और वैश्य ( भिक्षां देहि भवति ) ऐसा वाक्य कहे ॥ १३ ॥

यह शङ्ख स्मृति के भाषानुवाद में द्वितीय अध्याय पूरा हुआ ॥

गुरु शिष्य को यज्ञोपवीत कराकर प्रथम शौच [मल मूत्र के त्यागादि समय कैसे २ शुद्धि करे ] आचार [ धर्मानुकूल व्यवहार ] अग्नि कार्य ( नित्य सायंप्रातःकाल का समिदाधान) और सन्ध्योपासन की शिक्षा दे (सिखावे) ॥१॥

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