भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ५

सगुरुर्यःक्रियाःकृत्वा वेदमस्मैप्रयच्छति । भृतकाध्यापकोयस्तु उपाध्यायःसउच्यते ॥ २ ॥ मातापितागुरुश्चैव पूजनीयास्सदानृणाम् । क्रियास्तस्याफलाः सर्व्वायस्यैतेनादृतास्त्रयः ॥ ३ ॥ प्रयतःकल्यउत्थाय स्नातोहुतहुताशनः । कुर्वीतप्रणतोभक्त्या गुरूणामभिवादनम् ॥ ४ ॥ अनुज्ञातस्तुगुरुणा ततोऽध्ययनमाचरेत् । कृत्वाब्रह्माञ्जलिंपश्यन् गुरोर्वदनमानतः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावसानेप्रारम्भे प्रणवंचप्रकीर्त्तयेत् । अनध्यायेष्वध्ययनं वर्जयेच्चप्रयत्नतः ॥ ६ ॥ चतुर्दशींपञ्चदशीमष्टमींराहुसूतकम् । उल्कापातंमहीकम्पमाशौचंग्रामविप्लवम् ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाणंश्वरुतं सर्व्वसंघातानिःस्वनम् ।


जो शिष्य को कर्म [ जनेऊ आदि ] कराकर वेद पढ़ावे उसे गुरु कहते हैं । और जो कुछ द्रव्य मासिक वेतन लेकर पढ़ावे उसे उपाध्याय कहते हैं ॥ २ ॥ माता पिता और गुरु इन तीनों की मनुष्यों को सदा सेवा पूजा करनी चाहिये क्योंकि जिस पुत्र वा शिष्य ने इन तीनों का आदर सत्कार नहीं किया उस के सब पुण्य कर्म निष्फल से हैं ॥३॥ प्रातःकाल सावधान हो नियम से उठ कर स्नान और होम करके नम्रता से गुरुओं को अभिवादन करै ॥ ४ ॥ फिर गुरु की आज्ञा लेकर दोनों हाथ जोड़ के और गुरु के मुख को देखता हुआ नम्र होकर वेद का अध्ययन करै ॥५॥ वेद पढ़ने के प्रारम्भ समय और अन्त में (जब पढ़ चुके) ओंकार का उच्चारण करै । और अनध्यायों [ अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी, चतुर्दशी आदि दिनों ] में कदापि वेद को न पढ़े ॥ ६ ॥ चौदश, पूर्णिमा, अष्टमी, ग्रहण, उल्कापात, बिजली का तड़पना, भूकम्प अशौच (जन्म मरण का सूतक) ग्राम का उपद्रव ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाण (वर्षाकाल के इन्द्र धनुष का) दर्शन, कुत्ते का रोना, बहुतों के समूह का शब्द, बाजों का कोलाहल और युद्ध इन (चौदश आदि) अन-