अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६ शंखस्मृतिः ॥
वादकोलाहलंयुद्धमनध्यायान्विवर्जयेत् ॥ ८ ॥ नाधीयीताभियुक्तोपि यानगोनचनौगतः । देवायतनवल्मीकश्मशानशवसन्निधौ ॥ ९ ॥ भैक्षचर्यांतथाकुर्याद् ब्राह्मणेषुयथाविधि । गुरुणाचाप्यनुज्ञातः प्राश्नीयात्प्राङ्मुखःशुचिः ॥ १० ॥ हितंप्रियंगुरोः कुर्यादहंकारविवर्जितः । उपास्यपश्चिमां संध्यां पूजयित्वाहुताशनम् ॥ ११ ॥ अभिवाद्यगुरुंपश्चाद् गुरोर्वचनकृद् भवेत् । गुरोः पूर्वंसमुत्तिष्ठेच्छयीत चरमंतथा ॥ १२ ॥ मधुमांसाञ्जनं श्राद्धं गीतं नृत्यंचवर्जयेत् । हिंसांपरापवादंच स्त्रीलीलांचविशेषतः ॥ १३ ॥ मेखलामजिनंदण्डं धारयेच्चविशेषतः । अधःशायीभवेन्नित्यं ब्रह्मचारीसमाहितः ॥ १४ ॥ एवंव्रतंतु कुर्वीत वेदस्वीकरणंबुधः ।
ध्यायों में वेद को न पढ़े ॥ ८ ॥ यान (सवारी) पर चढ़ा नाव में बैठा और देवमन्दिर, बामी, श्मशान ( मरघट ) मुर्दा इन के समीप में बैठ कर वेदको न पढ़े ॥ ९ ॥ ब्राह्मण ब्रह्मचारी विशेष कर गृहस्थ ब्राह्मण के घर पूर्वोक्त विधि के सहित भिक्षा मांगे। गुरु की आज्ञा लेकर पूर्व को मुख करके शुद्धता से भोजन करे ॥ १० ॥ अहंकार को छोड़ कर गुरु का प्रिय काम और हितकारी कर्म करे और सायंकाल को संध्या और अग्नि में समिदाधान कर के ॥ ११ ॥ फिर गुरु को अभिवादन करके गुरु जो आज्ञा करें उसे करे और गुरु से पहिले उठे और पीछे सोवे ॥ १२ ॥ मधु ( महत वा मदिरा ), मांस, आंखों में अंजन वा सुरमा लगाना, श्राद्ध का भोजन, नाचना, गाना, बजाना, हिंसा, पराई निन्दा और विशेष कर स्त्रियों की लीला को छोड़देवे ॥ १३ ॥ मूंज आदि की मेखला, मृगछाला, दंड इन को विशेष कर नित्य धारण करे और ब्रह्मचारी सावधान रहता हुआ नियम से पृथिवी पर सोवे ॥ १४ ॥ वेद पढ़ने के समय विचार शील ब्रह्मचारी इस प्रकार व्रत नियम आदि करे और फिर वेदाध्ययनकी समाप्ति होने पर गुरुको दक्षिणा देकर गुरुकी आज्ञा