अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९
गुरवेऽथधनंदत्त्वा स्नायीततदनुज्ञया ॥ १५ ॥ ॥ इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ३ ॥ विन्देतविधिवद्भार्यामसमानार्षगोत्रजाम् । मातृतःपञ्चमींचापि पितृतस्त्वथसप्तमीम् ॥ १ ॥ ब्राह्मोदैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २ ॥ एषुधर्म्यास्तुचत्वारः पूर्व्वेयेपरिकीर्त्तिताः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव क्षत्रियस्यतुशस्यते ॥ ३ ॥ संप्रार्थितःप्रयत्नेन ब्राह्मस्तुपरिकीर्त्तितः । यज्ञस्थायर्त्विजेदैव आदायर्षस्तुगोद्वयम् ॥ ४ ॥ प्रार्थितःसंप्रदानेन प्राजापत्यःप्रकीर्त्तितः । आसुरोद्रविणादानाद् गान्धर्वःसमयान्मिथः ॥ ५ ॥
में समावर्त्तन स्नान कर के गृहस्थाश्रम को ग्रहण करे ॥ १५ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥
जो अपने गोत्र और प्रवर की न हो ऐसी स्त्री को वेदोक्त विधि से विवाहे अथवा जो अपनी माता के कुल में पांचवीं पीढ़ी की और पिता के कुल में सातवीं पीढ़ी की हो उसे विवाहे (यह पिछला मत एकदेशी है। इसी से संप्रति ऐसी चाल नहीं दीखती है ) ॥ १ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये आठ प्रकार के विवाह हैं और इन में आठवां पैशाच अधम नाम नीच काम है ॥ २ ॥ इनमें जो पहिले चार कहे हैं वे धर्म युक्त अच्छे विवाह हैं । गान्धर्व और राक्षस ये दोनों क्षत्रिय के लिये श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ बड़े यत्न से भली प्रकार प्रार्थना पूर्वक जो वेद विधि से विवाह हो उसे ब्राह्म कहते, यज्ञ में बैठे ऋत्विज् वर को जो कन्या वेद विधि से दी जाय वह विवाह दैव और वर से दो गौ वा उनका मूल्य लेकर जो कन्या वेद विधि से दी जाय उसे आर्ष विवाह कहते हैं ॥ ४ ॥
कन्या वाले से कन्या मांगने के लिये जहां वर प्रार्थना करे उस वेदोक्त विधिसे हुए विवाह को प्राजापत्य, द्रव्यलेकर जो विवाह हो उसे आसुर, कन्या और वर की परस्पर इच्छामात्र से जो विवाह हो उसे गांधर्व कहते हैं ॥५॥