भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसहिता ॥ ५

सगुरुर्यःक्रियाःकृत्वा वेदमस्मैप्रयच्छति । भृतकाध्यापकोयस्तु उपाध्यायःसउच्यते ॥ २ ॥ मातापितागुरुश्चैव पूजनीयास्सदानृणाम् । क्रियास्तस्याफलाः सर्व्वायस्यैतेनादृतास्त्रयः ॥ ३ ॥ प्रयतःकल्यउत्थाय स्नातोहुतहुताशनः । कुर्वीतप्रणतोभक्त्या गुरूणामभिवादनम् ॥ ४ ॥ अनुज्ञातस्तुगुरुणा ततोऽध्ययनमाचरेत् । कृत्वाब्रह्माञ्जलिंपश्यन् गुरोर्वदनमानतः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावसानेप्रारम्भे प्रणवंचप्रकीर्त्तयेत् । अनध्यायेष्वध्ययनं वर्जयेच्चप्रयत्नतः ॥ ६ ॥ चतुर्दशींपञ्चदशीमष्टमींराहुसूतकम् । उल्कापातंमहीकम्पमाशौचंग्रामविप्लवम् ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाणंश्वरुतं सर्व्वसंघातानिःस्वनम् ।


जो शिष्य को कर्म [ जनेऊ आदि ] कराकर वेद पढ़ावे उसे गुरु कहते हैं । और जो कुछ द्रव्य मासिक वेतन लेकर पढ़ावे उसे उपाध्याय कहते हैं ॥ २ ॥ माता पिता और गुरु इन तीनों की मनुष्यों को सदा सेवा पूजा करनी चाहिये क्योंकि जिस पुत्र वा शिष्य ने इन तीनों का आदर सत्कार नहीं किया उस के सब पुण्य कर्म निष्फल से हैं ॥३॥ प्रातःकाल सावधान हो नियम से उठ कर स्नान और होम करके नम्रता से गुरुओं को अभिवादन करै ॥ ४ ॥ फिर गुरु की आज्ञा लेकर दोनों हाथ जोड़ के और गुरु के मुख को देखता हुआ नम्र होकर वेद का अध्ययन करै ॥५॥ वेद पढ़ने के प्रारम्भ समय और अन्त में (जब पढ़ चुके) ओंकार का उच्चारण करै । और अनध्यायों [ अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी, चतुर्दशी आदि दिनों ] में कदापि वेद को न पढ़े ॥ ६ ॥ चौदश, पूर्णिमा, अष्टमी, ग्रहण, उल्कापात, बिजली का तड़पना, भूकम्प अशौच (जन्म मरण का सूतक) ग्राम का उपद्रव ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाण (वर्षाकाल के इन्द्र धनुष का) दर्शन, कुत्ते का रोना, बहुतों के समूह का शब्द, बाजों का कोलाहल और युद्ध इन (चौदश आदि) अन-

६ शंखस्मृतिः ॥

वादकोलाहलंयुद्धमनध्यायान्विवर्जयेत् ॥ ८ ॥ नाधीयीताभियुक्तोपि यानगोनचनौगतः । देवायतनवल्मीकश्मशानशवसन्निधौ ॥ ९ ॥ भैक्षचर्यांतथाकुर्याद् ब्राह्मणेषुयथाविधि । गुरुणाचाप्यनुज्ञातः प्राश्नीयात्प्राङ्मुखःशुचिः ॥ १० ॥ हितंप्रियंगुरोः कुर्यादहंकारविवर्जितः । उपास्यपश्चिमां संध्यां पूजयित्वाहुताशनम् ॥ ११ ॥ अभिवाद्यगुरुंपश्चाद् गुरोर्वचनकृद् भवेत् । गुरोः पूर्वंसमुत्तिष्ठेच्छयीत चरमंतथा ॥ १२ ॥ मधुमांसाञ्जनं श्राद्धं गीतं नृत्यंचवर्जयेत् । हिंसांपरापवादंच स्त्रीलीलांचविशेषतः ॥ १३ ॥ मेखलामजिनंदण्डं धारयेच्चविशेषतः । अधःशायीभवेन्नित्यं ब्रह्मचारीसमाहितः ॥ १४ ॥ एवंव्रतंतु कुर्वीत वेदस्वीकरणंबुधः ।


ध्यायों में वेद को न पढ़े ॥ ८ ॥ यान (सवारी) पर चढ़ा नाव में बैठा और देवमन्दिर, बामी, श्मशान ( मरघट ) मुर्दा इन के समीप में बैठ कर वेदको न पढ़े ॥ ९ ॥ ब्राह्मण ब्रह्मचारी विशेष कर गृहस्थ ब्राह्मण के घर पूर्वोक्त विधि के सहित भिक्षा मांगे। गुरु की आज्ञा लेकर पूर्व को मुख करके शुद्धता से भोजन करे ॥ १० ॥ अहंकार को छोड़ कर गुरु का प्रिय काम और हितकारी कर्म करे और सायंकाल को संध्या और अग्नि में समिदाधान कर के ॥ ११ ॥ फिर गुरु को अभिवादन करके गुरु जो आज्ञा करें उसे करे और गुरु से पहिले उठे और पीछे सोवे ॥ १२ ॥ मधु ( महत वा मदिरा ), मांस, आंखों में अंजन वा सुरमा लगाना, श्राद्ध का भोजन, नाचना, गाना, बजाना, हिंसा, पराई निन्दा और विशेष कर स्त्रियों की लीला को छोड़देवे ॥ १३ ॥ मूंज आदि की मेखला, मृगछाला, दंड इन को विशेष कर नित्य धारण करे और ब्रह्मचारी सावधान रहता हुआ नियम से पृथिवी पर सोवे ॥ १४ ॥ वेद पढ़ने के समय विचार शील ब्रह्मचारी इस प्रकार व्रत नियम आदि करे और फिर वेदाध्ययनकी समाप्ति होने पर गुरुको दक्षिणा देकर गुरुकी आज्ञा

भाषार्थसहिता ॥ ९

गुरवेऽथधनंदत्त्वा स्नायीततदनुज्ञया ॥ १५ ॥ ॥ इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ३ ॥ विन्देतविधिवद्भार्यामसमानार्षगोत्रजाम् । मातृतःपञ्चमींचापि पितृतस्त्वथसप्तमीम् ॥ १ ॥ ब्राह्मोदैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २ ॥ एषुधर्म्यास्तुचत्वारः पूर्व्वेयेपरिकीर्त्तिताः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव क्षत्रियस्यतुशस्यते ॥ ३ ॥ संप्रार्थितःप्रयत्नेन ब्राह्मस्तुपरिकीर्त्तितः । यज्ञस्थायर्त्विजेदैव आदायर्षस्तुगोद्वयम् ॥ ४ ॥ प्रार्थितःसंप्रदानेन प्राजापत्यःप्रकीर्त्तितः । आसुरोद्रविणादानाद् गान्धर्वःसमयान्मिथः ॥ ५ ॥


में समावर्त्तन स्नान कर के गृहस्थाश्रम को ग्रहण करे ॥ १५ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥

जो अपने गोत्र और प्रवर की न हो ऐसी स्त्री को वेदोक्त विधि से विवाहे अथवा जो अपनी माता के कुल में पांचवीं पीढ़ी की और पिता के कुल में सातवीं पीढ़ी की हो उसे विवाहे (यह पिछला मत एकदेशी है। इसी से संप्रति ऐसी चाल नहीं दीखती है ) ॥ १ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये आठ प्रकार के विवाह हैं और इन में आठवां पैशाच अधम नाम नीच काम है ॥ २ ॥ इनमें जो पहिले चार कहे हैं वे धर्म युक्त अच्छे विवाह हैं । गान्धर्व और राक्षस ये दोनों क्षत्रिय के लिये श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ बड़े यत्न से भली प्रकार प्रार्थना पूर्वक जो वेद विधि से विवाह हो उसे ब्राह्म कहते, यज्ञ में बैठे ऋत्विज् वर को जो कन्या वेद विधि से दी जाय वह विवाह दैव और वर से दो गौ वा उनका मूल्य लेकर जो कन्या वेद विधि से दी जाय उसे आर्ष विवाह कहते हैं ॥ ४ ॥

कन्या वाले से कन्या मांगने के लिये जहां वर प्रार्थना करे उस वेदोक्त विधिसे हुए विवाह को प्राजापत्य, द्रव्यलेकर जो विवाह हो उसे आसुर, कन्या और वर की परस्पर इच्छामात्र से जो विवाह हो उसे गांधर्व कहते हैं ॥५॥

८ शंखस्मृतिः ॥

राक्षसोयुद्धहरणात्पैशाचःकन्यकाछलात् ।
तिस्रस्तुभार्याविप्रस्य द्वेभार्येक्षत्रियस्यतु ॥ ६ ॥
एकैवभार्यावैश्यस्य तथाशूद्रस्यकीर्त्तिता ।
ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्या विप्रभार्याःप्रकीर्त्तिताः॥ ७ ॥
क्षत्रियाचैववैश्याच क्षत्रियस्यविधीयते ।
वैश्याचभार्यावैश्यस्य शूद्राशूद्रस्यकीर्त्तिता ॥ ८ ॥
आपद्यपिनकर्त्तव्या शूद्राभार्याद्विजन्मना ।
तस्यांतस्यप्रसूतस्य निष्कृतिर्नविधीयते ॥ ९ ॥
तपस्वीयज्ञशीलस्तु सर्वधर्मभृतांवरः ।
ध्रुवंशूद्रत्वमायाति शूद्रान्नाद्येत्रयोदशे ॥ १० ॥
नीयतेतुसपिण्डत्वं येषांशूद्रःकुलोद्भवः ।
सर्वेशूद्रत्वमायान्ति यदिस्वर्गजितश्चते ॥ ११ ॥
सपिण्डीकरणंकार्यं कुलजस्यतथाध्रुवम् ।


युद्ध करके जो कन्या हरी जाय उसे राक्षस और छल से चुराकर कन्या लेली जाय उसे पैशाच विवाह कहते हैं। ब्राह्मण के तीन स्त्री और क्षत्रिय के दो स्त्री हो सकती हैं ॥ ६ ॥ वैश्य और शूद्र के एक २ ही स्त्री हो सकती है, ब्राह्मणी, क्षत्रिया, और वैश्या ये तीन ब्राह्मण की भार्या कही हैं ॥ ७ ॥ क्षत्रिया और वैश्या क्षत्रिय की भार्या * और वैश्य की वैश्या और शूद्र की शूद्रा ही भार्या होती हैं ॥ ८ ॥ आपत्काल में भी ब्राह्मणादि तीनों द्विज शूद्रा के साथ विवाह न करें क्योंकि शूद्रा में पैदा हुए द्विजाति का कोई प्रायश्चित्त नहीं है किन्तु वह पतित ही हो जाता है ॥ ९ ॥ चाहे कैसा ही तपस्वी, यज्ञशील, और सब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भी ब्राह्मण शूद्र के त्रयोदशाह (तेरहवीं) श्राद्ध में जीमने से निश्चय कर शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥ द्विजों के कुल में पैदा हुआ शूद्र जिन द्विजों की सपिण्डी श्राद्ध करे चाहे वे स्वर्ग के भी जीतने वाले हों तो भी वे सब शूद्र हो जाते हैं॥११॥ तिस से कुल में उत्पन्न हुए का बारहवें दिन का श्राद्ध करके त्रयोदशाह


* अपने २ वर्ण की एक २ स्त्री से विवाह करना धर्मशास्त्रानुकूल उत्तम पक्ष है। और स्ववर्ण की वा अन्य वर्ण की एक से अधिक स्त्रियों के साथ विवाह करना कामी जनों को व्यभिचार से बचाने के लिये मध्यम पक्ष है।

भाषार्थसंहिता ॥ ९

श्राद्धद्वादशकंकृत्वा श्राद्धे प्राप्तेत्रयोदशे ॥ १२ ॥
सपिण्डीकरणेचार्हेन्नचशूद्रःकथञ्चन ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शूद्रांभार्यांविवर्जयेत् ॥ १३ ॥
पाणिर्ग्राह्यस्सवर्णासु गृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् ।
वैश्याप्रतोदमादद्याद्वेदेनेत्वग्रजन्मनः ॥ १४ ॥
साभार्यायागृहेदक्षा साभार्यायापतिव्रता ।
साभार्यायापतिप्राणा साभार्यायाप्रजावती ॥ १५ ॥
लालनीयासदाभार्या ताडनीयातथैवच ।
ताडितालालिताचैव स्त्रीश्रीर्भवतिनान्यथा ॥ १६ ॥
इतिशांखेधर्मशास्त्रेचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पञ्चसूनागृहस्थस्य चुल्लीपेषण्युपस्करः ।
कण्डनीचोदकुम्भश्च तस्यपापस्यशान्तये ॥ १ ॥
पञ्चयज्ञविधानन्तु गृही नित्यंनहापयेत् ।


श्राद्ध के दिन अवश्य सपिण्डीकरण करे ॥ १२ ॥ द्विज कुल में पैदा हुआ शूद्र कदापि सपिण्डी करने योग्य नहीं है. तिस से संपूर्ण यत्न से शूद्रा स्त्री से कदापि विवाह न करे ॥ १३ ॥ ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी के विवाह में ब्राह्मणी का हाथ, क्षत्रिया बाण को, वैश्या प्रतोद (पैना) को ग्रहण करे ॥ १४ ॥ जो घर के कामों में चतुर हो, जो पतिव्रता हो, वा जिस के प्राणपति में बसते हों, और जो पुत्रादि सन्तानों वाली हो, वही उत्तम भार्या है ॥ १५ ॥ भार्या को सदैव लालना (लाड़) करे और अनुचित पर ताड़ना भी करे क्योंकि लालना और ताड़ने से ही वह स्त्री लक्ष्मी होती है अन्यथा नहीं ॥ १६ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

गृहस्थ पुरुष को ये पांच प्रकार की हत्या नाम दोष प्रति दिन लगता है कि चूल्ही, चक्की, मार्जनी, (बुहारी) कण्डनी (ओखली) और जल का घड़ा, उस हत्यारूप पाप की शान्ति के लिये ॥ १ ॥ गृहस्थ पुरुष पांच महायज्ञों को प्रतिदिन न त्यागे, क्योंकि पांच महायज्ञों के करने से गृहस्थ का उन

१० शंखस्मृतिः ॥

पञ्चयज्ञविधानेन तत्पापंतस्यनश्यति ॥ २ ॥ देवयज्ञोभूतयज्ञः पितृयज्ञस्तथैवच । ब्रह्मयज्ञोनृयज्ञश्च पञ्चयज्ञाःप्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥ होमोदैवोबलिर्भौतः पित्र्यःपिण्डक्रियास्मृतः । स्वाध्यायोब्रह्मयज्ञश्च नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ४॥ वानप्रस्थोब्रह्मचारी यतिश्चैवतथाद्विजः । गृहस्थस्यप्रसादेन जीवन्त्येतेयथाविधि ॥ ५ ॥ गृहस्थएवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः । ददातिचगृहस्थश्च तस्माच्छ्रेयान्गृहाश्रमी ॥ ६ ॥ यथाभर्त्ताप्रभुःस्त्रीणां वर्णानांब्राह्मणोयथा । अतिथिस्तद्वदेवास्य गृहस्थस्यप्रभुःस्मृतः ॥ ७ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च धर्मेणविविधेनच । नारीस्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपतिपूजनात् ॥ ८ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च नचयज्ञैःपृथग्विधैः ।


हत्याओं सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥ देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, और मनुष्ययज्ञ, ये पांच महायज्ञ कहाते हैं ॥ ३ ॥ लवण रहित भोजन के वस्तु भात आदि का होम देवयज्ञ, उन २ के नाम से भूमि या पत्तों पर ग्रास धरना भूतयज्ञ, पितरों के लिये अपसव्य से पिण्डदान को पितृयज्ञ, विधिपूर्वक वेदादि का पाठ ब्रह्मयज्ञ और अतिथि का भोजनादि से सत्कार पूजन, मनुष्ययज्ञ कहाता है ॥ ४ ॥ वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, और सन्यासी ये तीनों, द्विज गृहस्थ के भिक्षारूप प्रसाद से यथाविधि (यथार्थ से) जीवते हैं ॥ ५ ॥ गृहस्थ ही यज्ञ करता, गृहस्थ ही तप करता और गृहस्थ ही दान देता है तिस से गृहस्थाश्रम ही सब से उत्तम है ॥ ६ ॥ जैसे स्त्रियों का रक्षक पति, जैसे वर्णों का रक्षक ब्राह्मण है इसी प्रकार गृहस्थ का प्रभु अतिथि कहाताहै ॥७॥ व्रत उपवास और अनेक प्रकारके धर्मसेवन से स्त्री स्वर्गको प्राप्त नहीं होती किन्तु श्रद्धाभक्ति के साथ तन मन धन से पतिकी सेवा पूजा से स्त्री को निश्चित स्वर्ग होता है ॥८॥ व्रत, उपवास, और अपने किये अनेक प्रकार

भाषार्थसहिता ॥ ९१

राजास्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपरिपालनात् ॥ ९ ॥
नस्नानेननमौनेन नैवाग्निपरिचर्य्यया ।
ब्रह्मचारीदिवंयाति सयातिगुरुपूजनात् ॥ १० ॥
नाग्निशुश्रूषयाक्षान्त्या स्नानेनविविधेनच ।
वानप्रस्थोदिवंयाति यातिभोजनवर्जनात् ॥ ११ ॥
नदण्डैर्नचमौनेन शून्यागाराश्रयेणच ।
यतिःसिद्धिमवाप्नोति योगेनाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ १२ ॥
नयज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्वन्हिशुश्रूषयातथा ।
गृहीस्वर्गमवाप्नोति यथाचातिथिपूजनात् ॥ १३ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गृहस्थोऽतिथिमागतम् ।
आहारशयनाद्येन विधिवत्प्रतिपूजयेत् ॥ १४ ॥
सायंप्रातश्चजुहुयादग्निहोत्रंयथाविधि ।
दर्शञ्चपूर्णमासंच जुहुयाद्विधिवत्तथा ॥ १५ ॥


के यज्ञों से राजा स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता किन्तु धर्मानुसार ठीक २ प्रजा की रक्षा करने से राजा को स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ स्नान (शुद्धि) मौन रहना और अग्नि की सेवा (समिदाधान) इन से ब्रह्मचारी स्वर्ग में नहीं जाता किन्तु गुरु की सेवा पूजा करने से स्वर्ग में जाता है ॥ १० ॥ अग्नि की सेवा (पञ्चाग्निताप) क्षमा, और अनेक प्रकार के वार २ स्नान करने से वानप्रस्थ स्वर्ग में तिस प्रकार नहीं जाता कि जैसे भोजन के त्याग से जाता है अर्थात् उपवासों द्वारा इन्द्रियों की चंचलता मिटती है परमार्थ के विचारों में विघ्न नहीं होता ॥ ११ ॥ तीन दण्डों से, मौन से, और शून्य स्थान में रहने से सन्यासी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता किन्तु योगाभ्यास से ही सर्वोत्तम गति वा सिद्धि को प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ दक्षिणा वाले बड़े २ यज्ञों और ग्रीष्मकाल अग्रियों की सेवा रूप अग्निहोत्र से गृहस्थ पुरुष वैसा स्वर्ग में प्राप्त नहीं होता कि जैसा अतिथि के पूजन से उस को स्वर्ग होता है ॥ १३ ॥ तिस से गृहस्थ पुरुष आये हुये अतिथि को सम्पूर्ण यत्न से भोजन और शय्या आदि देकर विधि पूर्वक पूजन करे ॥ १४ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल से अग्निहोत्र करे और दर्शेटि तथा पूर्णमासेष्टियों को भी विधिपूर्वक प्रतिमास किया करे ॥ १५ ॥

९२ | शंखस्मृतिः ॥

यजेतपशुबन्धैश्च चातुर्मास्यैस्तथैव च ।
त्रैवार्षिकाधिकान्नस्तु पिबेत्सोममतन्द्रितः ॥ १६ ॥
इष्टिं वैश्वानरीं कुर्यात्तथाचाल्पधनो द्विजः ।
न भिक्षेत धनं शूद्रात्सर्वं दद्याच्च भिक्षितम् ॥ १७ ॥
वृतन्तु न त्यजेद्विद्वानृत्विजं पूर्वमेव च ।
कर्मणा जन्मना शुद्धं विद्यया च वृणीत तम् ॥ १८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तं धर्मार्जितधनं तथा ।
याजयीत सदा विप्रो ग्राह्यस्तस्मात्प्रतिग्रहः ॥ १९ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ १ ॥
पुत्रेषु दारान् निक्षिप्य तया वानुगतो वनम् ।
अग्नीनुपचरेन्नित्यं वन्यमाहारमाहरेत् ॥ २ ॥


पशुबन्ध यज्ञों और चातुर्मास्य यज्ञों के वैश्वदेवादि चारों पर्वों द्वारा ईश्वर की पूजा करे और तीन वर्ष के निर्वाह से अधिक अन्न का सञ्चय रखने वाला पुरुष हो तो आलस्य छोड़ कर सोम अर्थात् अग्निष्टोम यज्ञ करे ॥ १६ ॥

यदि थोड़े धन वाला ब्राह्मण होतो वैश्वानरी इष्टि कल्पशास्त्र में लिखे अनुसार करे और यज्ञ के लिये शूद्र से धन न मांगे और द्विजों से मांगा भिक्षा का सब धन यज्ञ के अन्त में दान करदेवे ॥ १७ ॥ विद्वान् मनुष्य विधि से वरण (स्वीकार) किये ऋत्विज का त्याग न करे । जन्म तथा कर्म से शुद्ध हो तथा विद्या से पूर्ण हो उसी ऋत्विज का वर्ण करे ॥ १८ ॥ इन्हीं पूर्व गुणों से जो युक्त हो, तथा धर्मानुकूल उपाय से जिस ने धन का संचय किया हो उसी को विद्वान् ब्राह्मण सदैव यज्ञ करावे और उसी से प्रतिग्रह-दान लेवे ॥ १९ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

गृहस्थ पुरुष जब अपने देह में वली (त्वचा की सकुड़न) पलित (बालों का सफेद होना) देखे और पुत्र के पुत्र या कन्या हो जाय, तब वह वन में चला जावे अर्थात् वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करे ॥ १ ॥ पुत्रों के समीप अपनी स्त्री को सौंप कर अथवा स्त्री को भी संग लेकर वनमें जाकर श्रौतस्मार्त अग्नियों की सेवा करे अर्थात् वन में भी विधिपूर्वक अग्निहोत्र कियाकरे और जो वनमें पैदा हों उन कन्द मूल आदिका ही भोजन करे ॥ २ ॥

भाषार्थसहिता ॥ १३

यदाहारोभवेत्तेन पूजयेत्पितृदेवताः ।
तेनैवपूजयेन्नित्यमतिथिंसमुपागतम् ॥ ३ ॥
ग्रामादाहृत्यवाश्नीयादष्टौग्रासान्समाहितः ।
स्वाध्यायंचतथाकुर्याज्जटाश्चैवबिभृयात्तथा ॥ ४ ॥
तपसाशोषयेन्नित्यं स्वयञ्चैवकलेवरम् ।
आर्द्रवासास्तुहेमन्ते ग्रीष्मेपञ्चतपास्तथा ॥ ५ ॥
प्रावृष्याकाशशायीच नक्ताशांचसदाभवेत् ।
चतुर्थकालिकोवास्यात् षष्ठकालिकएववा ॥ ६ ॥
कृच्छ्रैर्वापिनयेत्कालं ब्रह्मचर्यञ्चपालयेत् ।
एवंनीत्वावनेकालं द्विजोग्रह्माश्रमीभवेत् ॥ ७ ॥

इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

कृत्वेष्टिंविधिवत्पश्चात् सर्ववेदसदक्षिणाम् ।


जो फल मूल आदि अपना भोजन हो उसी से पितर, देवता, और आये हुये अतिथि का नित्य पूजन करे ॥ ३ ॥ अथवा सावधान रहता हुआ ग्रामस्थ द्विजों के घरों से लाकर आठ ग्रास भोजन प्रतिदिन एकवार खाया करे। वेदको नित्य पढ़े और शिर पर जटाओं को रखा लेवे ॥ ४ ॥ तप से अपने शरीर को सुखा देवे, शीत काल में आर्द्र (भीगे) वस्त्र पहिने और ग्रीष्म (गरमी) में पंचाग्नि को तपे अर्थात् चारों दिशा में अग्नि सिलगावे बीच में आसन डाल कर बैठे ऊपर से सूर्य का घाम होवे ॥५॥ वर्षा में आकाश खुले (मैदान) में लेटे और सदैव रात्रि में ही भोजन करे अथवा चौथे काल में वा छठे काल में एक बार भोजन करे ॥६॥ अथवा कृच्छ्र व्रत के नियम से ही अपने काल को बितावे और ब्रह्मचर्य का पालन करे इस प्रकार ब्राह्मण अपने वानप्रस्थ समय को बिताकर संन्यास आश्रम का ग्रहण करे ॥ ७ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥

वानप्रस्थ का नियम पूरा होने पश्चात् सर्ववेदस नाम अपना सब पदार्थ जिस में दक्षिणा देदिया जाय ऐसी प्राजापत्या इष्टि करके और अपने आ-त्मा में ही अग्नियों का विधिपूर्वक समारोप करके संन्यास आश्रम को

१४ शंखस्मृतिः ॥

आत्मन्यग्नीन्समारोप्य द्विजोब्रह्माश्रमीभवेत् ॥ १ ॥
विधूमेन्यस्तमुसले व्यङ्गारेभुक्तवज्जने ।
अतीतेपात्रसम्पाते नित्यंभिक्षांयतिश्चरेत् ॥ २ ॥
सप्तगारांश्चरेद्भैक्षं भिक्षितंनानुभिक्षयेत् ।
नव्यथेच्चतथाऽलाभे यथालब्धेनवर्तयेत् ॥ ३ ॥
नास्वादयेत्तथैवान्नं नाश्नीयात्कस्यचिद्गृहे ।
मृन्मयालाबुपात्राणि यतीनांचविनिर्दिशेत् ॥ ४ ॥
तेषांसंमार्जनाच्छुद्धिरद्भिर्श्चैवप्रकीर्तिता ।
कौपीनाच्छादनंवासा विभृयादव्यथञ्चरन् ॥५॥
शून्यागारनिकेतःस्याद्यत्रसायंगृहोमुनिः ॥६॥
दृष्टिपूतंन्यसेत्पादं वस्त्रपूतंजलंपिबेत् ।
सत्यपूतांवदेद्वाचं मनःपूतंसमाचरेत् ॥७॥
चन्दनेनतुलिप्ताङ्गं वास्यैवं चैवतक्षतः ।


ग्रहण करे ॥ १ ॥ जब ग्राम में धूम उठना बन्द हो जाय, ऊखली से चावल निकाल कर मूसल भी जहां के तहां रख दिये हों, मनुष्यों ने भोजन भी कर लिये हों, रसोई या जल के पात्रों का इधर उधर ले जाना भी बन्द हो गया हो, तब संन्यासी भिक्षा के लिये नित्य गाम में जावे ॥२॥ सात घरों से भिक्षा मांगे, जिस के घर में भिक्षा मांग चुका हो फिर वहां से भिक्षा न मांगे, भिक्षा के न मिलने से दुःखी न हो और जितना मिले उतने से ही सन्तोष मान कर निर्वाह करे ॥ ३ ॥ अन्न को स्वाद ले २ कर न खाये, किसी के घर निमन्त्रित हो भोजन न करे और मिट्टी अथवा तुम्बी के पात्र यतियों के लिये शास्त्र में कहे हैं उन्हीं पात्रों से जलपानादि काम करे ॥४॥ और उन पात्रों की शुद्धि केवल जल से धोने से हो जाती है और सुख दुःख न मान कर उदासीन दशा में विचरता हुआ संन्यासी कौपीन और गुदड़ी दो ही वस्त्रों को धारण करे ॥ ५ ॥ जिस में अन्य कोई न रहता हो ऐसे शून्य घर में रात को रहे । जहां सायंकाल हो जाय वहीं ठहर जावे, मौन रहे ॥ ६ ॥ दृष्टि से देखकर मार्ग में पग रक्खे, वस्त्र से छानकर जल पीवे, सत्य वाणी बोले, और शुद्ध मन से विचरण करे ॥ ७ ॥ कोई पुरुष संन्यासी के किसी अंग में चन्दन लगाता हो, वा किसी अङ्ग को कोई काटता हो तो उन दोनों का भला बुरा

भाषार्थसंहिता ॥ १५

कल्याणंचाप्यकल्याणं तयोरेवनचिन्तयेत् ॥८॥
सर्वभूतसमोमैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ध्यानयोगरतोभिक्षुः प्राप्नोतिपरमाङ्गतिम् ॥९॥
जन्मनायस्तुनिर्मुक्तो मरणेनतथैवच ।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव तंदेवाब्राह्मणंविदुः ॥१०॥
अशुचित्वंशरीरस्य प्रियाप्रियविपर्ययः ।
गर्भवासेचवसतिस्तस्मान्मुच्येतनान्यथा ॥११॥
जगदेतन्निराक्रन्दं नतुसारमनर्थकम् ।
भोक्तव्यमितिनिर्द्दिष्टो मुच्यतेनात्रसंशयः ॥१२॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्चकिल्विषम् ।
प्रत्याहारेणसंसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥१३॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥१४॥


कुछ भी चिन्तन न करे ॥ ८ ॥ सब प्राणियों पर सम दृष्टि रक्खे, सब को मित्र माने; मट्टी का ढेला, पत्थर, सोना, इनको एकसा समझे । ध्यान और योगाभ्यास में तत्पर रहे ऐसा जो भिक्षु संन्यासी है वह परमगति को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ जीवते ही जो जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त है, मन की पीड़ा और देह के रोग भी जिस को नहीं सताते, देवता लोग उसी को ब्राह्मण कहते हैं ॥ १० ॥ शरीर का अशुद्ध होना, प्रिय के स्थान में अप्रिय और अप्रिय के स्थान में प्रिय हो, मलिन स्थान गर्भ में वास होना, इन सब से संन्यास के बिना नहीं छूट सकता ॥११॥ यह जगत् बड़ा दारुण है, इसमें कुछ सार नहीं और अनर्थ रूप है। इसमें कर्मफल भोगना अवश्य है, इस बुद्धि से जो दुःख भोगता है, वह मुक्त होता है इस में संदेह नहीं है ॥ १२ ॥ प्राणायामों द्वारा इन्द्रियों के दोषोंको, और धारणाओं से शारीरकादि पापोंको भस्म करे । प्रत्याहार से संगों को और ध्यान द्वारा ईश्वर विरोधी नास्तिकता आदि को नष्ट करे ॥१३॥ प्राणोंको रोककर सात व्याहृति, ओंकार, और (आपोज्योती०) इस शिरोमन्त्र सहित गायत्री के तीन बार पढ़ने को प्राणायाम कहते हैं ॥१४॥

१६ शंखस्मृतिः ॥

मनसःसंयमस्तज्ज्ञैर्धारणेतिनिगद्यते ।
संहारश्चेन्द्रियाणांच प्रत्याहारःप्रकीर्तितः ॥१५॥
हृदिस्थध्यानयोगेन देवदेवस्यदर्शनम् ।
ध्यानंप्रोक्तंप्रवक्ष्यामि ध्यानयोगमतःपरम् ॥१६॥
हृदिस्थादेवतास्सर्वा हृदिप्राणाःप्रतिष्ठिताः ।
हृदिज्योतींषि सूर्यश्च हृदिसर्वंप्रतिष्ठितम् ॥१७॥
स्वदेहमरणिंकृत्वा प्रणवंचोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्विष्णुंपश्येद्वृदिस्थितम् ॥१८॥
हृद्यर्कश्चन्द्रमासूर्यः सोमोमध्येहुताशनः ।
तेजोमध्येस्थितंसत्त्वं सत्त्वमध्यस्थितोऽच्युतः ॥१९॥
अणोरणीयान्महतोमहीयानात्मास्यजन्तौर्निहितोगुहायाम्।
तेजोमयंपश्यतिवीतशोको धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः॥२०
वासुदेवस्तमोऽन्धानां प्रत्यक्षोनैवजायते ।
अज्ञानपटसंवीतैरिन्द्रियैर्विषयेप्सुभिः ॥२१॥
एषवैपुरुषोविष्णुर्व्यक्ताव्यक्तःसनातनः ।


संयमके जानने वाले मन के रोकने को धारणा कहते हैं, विषयों से इन्द्रियों के हटाने को प्रत्याहार कहते हैं ॥ १५ ॥ हृदय में ध्यान के योग से ब्रह्म के साक्षात् करने को ध्यान कहते हैं। इससे आगे ध्यानयोग को कहते हैं ॥१६॥ सब देवता, प्राण, तारागण, और सूर्य ये सब अध्यात्म रूप से हृदय में भी स्थित हैं ॥१७॥ अपने शरीर को नीचे की अधरारणी और ओंकार को ऊपर की अरणी मानके ध्यान के निरन्तर मन्थन रूप अभ्याससे हृदयमें स्थित विष्णु भगवान् के दिव्य रूप को देखे ॥१८॥ सूर्य, चन्द्रमा, फिर सूर्य, चन्द्रमा और इन चारों के बीच में अग्नि हृदय में रहते हैं। तेज के मध्य में सत्व गुण स्थित है, सत्त्वगुण में अच्युत (विष्णु) स्थित हैं ॥१९॥ छोटे से भी छोटा बड़ों से भी बड़ा आत्मा इस मनुष्य के हृदय में ठहरा हुआ है, नष्ट हो गया है शोक जिस का ऐसा पुरुष तेजोरूप आत्मा की महिमा को विधाता की दयासे देखता है ॥२०॥ अज्ञानान्धकार मे अन्धे हुए मनुष्यों को वासुदेव भगवान् प्रत्यक्ष नहीं होते, क्योंकि उन के विषय भोगों के लालची इन्द्रिय अज्ञानरूपी वस्त्रों से ढंपे हैं ॥ २१ ॥ यह पुरुष [ हृदय में सोने वाला ] विष्णु ( व्यापक ) प्रकट

भाषार्थसहिता ॥ ९३

एषधाताविधाताच पुराणोनिष्कलःशिवः ॥२२॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
यंवैविदित्त्वानबिभेतिमृत्योर्नान्यः पन्थाविद्यतेऽनाय २३
पृथिव्यापस्तथातेजो वायुराकाशमेवच ।
पञ्चैतानिविजानीयान्महाभूतानिपण्डितः ॥२४॥
चक्षुःश्रोत्रं स्पर्शनंच रसनं घ्राणमेवच ।
बुद्धीन्द्रियाणिजानीयात्पञ्चैमानिशरीरके ॥२५॥
रूपंशब्दस्तथास्पर्शो रसोगन्धस्तथैवच ।
इन्द्रियार्थान्विजानीयात्पञ्चैत्रसततं बुधः ॥ २६ ॥
हस्तौपादावुपस्थंच जिह्वापायुस्तथैवच ।
कर्मेन्द्रियाणिपञ्चैव नित्यमस्मिञ्शरीरके ॥ २७ ॥
मनोबुद्धिस्तथैवात्मा ह्यव्यक्तंचतथैवच ।
इन्द्रियेभ्यःपराणीह चत्वारिकथितानिच ॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यर्थेतानि तत्त्वानिकथितानिच ।


और अप्रकट सगुण तथा निर्गुणरूपों से नित्य है । यही धाता, विधाता, प्राचीन, कलाहीन और कल्याण स्वरूप है ॥ २२ ॥ इस को मैं महान् सूर्य के समान तेज वाला और तमोगुण से परे जानता हूं कि जिस को जान कर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता और इस से भिन्न मोक्ष के लिये कोई मार्ग नहीं है ॥ २३ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इन पांच को पण्डित लोग महा भूत जानें ॥२४॥ १-नेत्र, २-कान, ३-त्वचा, ४-रसना, (जिह्वा के अग्र भाग में रहता इन्द्रिय ) ५-घ्राण ( नाक के अग्र भाग में रहता है ) इन पांचो को इस शरीर में ज्ञान इन्द्रिय जानना चाहिये ॥ २५ ॥ रूप, शब्द, स्पर्श, रस, गंध, इन पांचों को उक्त इन्द्रियों के पांच विषय पण्डित लोग निरन्तर जानें ॥ २६ ॥ हाथ, पांव, उपस्थ, जिह्वा, और गुदा ये पांच इस शरीर में नित्य सम्बद्ध कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २७ ॥ मन, बुद्धि, आत्मा, ( महत्तत्त्व ) अव्यक्त ( प्रधान ) ये चार तत्त्व इन्द्रियों से परे [सूक्ष्म या कारण रूप] कहे हैं ॥२८॥ ये पूर्वोक्त चौबीस तत्त्व कहाते हैं, और आत्मा जो पुरुष ( ईश्वर है वह

१८ शंखस्मृतिः ॥

तथात्मानंतदृत्यतीतं पुरुषंपञ्चविंशकम् ॥ २९ ॥
यन्तुज्ञात्वाविमुच्यन्ते येजनाःसाधुवृत्तयः ।
तदिदंपरमंगुह्यमेतदक्षरमुत्तमम् ॥ ३० ॥
अशब्दरसमस्पर्शमरूपंगन्धवर्जितम् ।
निर्दुःखमसुखंशुद्धं तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३१ ॥
अजंनिरञ्जनंशान्तमव्यक्तन्ध्रुवमक्षरम् ।
अनादिनिधनंब्रह्म तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३२ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवन्धनः ।
सोऽध्वनःपारमाप्नोति तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३३ ॥
वालाग्रशतशोभागः कल्पितस्तुसहस्रधा ।
तस्यापिशतमाद्भागाज्जीवःसूक्ष्मउदाहृतः ॥ ३४ ॥
इन्द्रियेभ्यःपराह्यर्था अर्थेभ्यश्चपरम्मनः ।
मनसस्तुपराबुद्धिर्बुद्धेरात्मातथापरः ॥ ३५ ॥
महतःपरमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।


पञ्चीसवां उक्त चौबीस तत्त्वों से परे है ॥ २९ ॥ जो मनुष्य साधु नाम शुद्ध स्वभाव के हैं वे जिस को जान कर मुक्त होते हैं। सो यह ब्रह्म परम (श्रेष्ठ) गुप्त अविनाशी और सर्वोत्तम है ॥ ३० ॥ उस आत्मा में शब्द नहीं, रस नहीं, स्पर्श नहीं, रूप नहीं, गन्ध नहीं है जिसमें, न दुःख है न सुख है वही विष्णु व्यापक परमात्मा का शुद्ध परम पद है ॥ ३१ ॥ जो जन्म और कर्मों की वासनाओं से शून्य, शान्त, अप्रत्यक्ष, नित्य, अविनाशी है, जिसके आदि और अन्तभी नहीं हैं और जो ब्रह्मरूप है वही विष्णु भगवान् का परमपद है ॥ ३२ ॥ जिस मनुष्य का विज्ञान ही सारथि है और प्रग्रह (लगाम की रश्मी) से जिस का मन बंधा है वही संसार मार्ग के परले छोर पर वर्त्तमान उस विष्णु भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ बाल ( केश ) के अग्रभाग के एक हजार टुकड़े किये जायं उन में से एक टुकड़े का जो सौवां भाग उससे भी सूक्ष्म ( छोटा ) जीव कहा है ॥ ३४ ॥ इन्द्रियों से परे नाम सूक्ष्म कारण रूप अर्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामक विषय) हैं अर्थों से परे सूक्ष्म कारण मन, मनसे परे बुद्धि और बुद्धि से परे सूक्ष्म कारण (महतत्त्व) वा जीव पदवाच्य आत्मा है ॥ ३५ ॥ महत्तत्त्व से परे सूक्ष्म कारण अव्यक्त नाम प्रधान व प्रकृति है, अव्यक्त से परे सूक्ष्म

भाषाधर्मसंहिता ॥ १९

पुरुषान्नपरंकिञ्चित् साकाष्ठासापरागतिः ॥ ३६ ॥
एषसर्वेषुभूतेषु तिष्ठत्यविकलःसदा ।
दृश्यतेत्वग्र्ययाबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः ॥ ३७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं क्रियाङ्गमलकर्षणम् ।
क्रियास्नानं तथाषष्ठं षोढास्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥
अस्नातःपुरुषोऽनर्हो जप्यौग्निहवनादिषु ।
प्रातःस्नानंतदर्थंच नित्यस्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ २ ॥
चण्डालशवपूयाद्यं स्पृष्ट्वास्नानंरजस्वलाम् ।
स्नानाऽनर्हस्तुयःस्नाति स्नानंनैमित्तिकंचतत् ॥ ३ ॥
पुण्यस्नानादिकंस्नानं दैवज्ञविधिचोदितम् ।
तद्धिकाम्यंसमुद्दिष्टं नाकामस्तत्प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥
जप्तुकामःपवित्राणि अर्चिष्यन्देवतापितॄन् ।


पुरुष है । और पुरुष नाम (ब्रह्म) से परे सूक्ष्म कारण और कुछ नहीं है किन्तु वही स्थिरता की अन्तिम सीमा और वही परम गति है ॥ ३६ ॥ वह परमात्मा इन सब चराचर भूतों में सदैव अविकल एकमा कपड़ों में कपास वा सूत के समान ठहरा हुआ है । सूक्ष्म बुद्धि वाले मनुष्य, नवीन सूक्ष्म बुद्धि से उस ब्रह्म को देखते हैं ॥ ३७ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियांग, मलकर्षण, क्रियास्नान, यह छः प्रकार का स्नान कहाता है ॥ १ ॥ बिना स्नान किये मनुष्य जप सन्ध्या तथा अग्निहोत्र आदि के करने में अयोग्य होता है इसलिये सदा प्रातःकाल का स्नान नित्य स्नान कहाता है ॥ २ ॥ चांडाल, [ भंगी ] शव, [मुर्दा] पूय, राध-पीव, और रजस्वला स्त्री इनको स्पर्श (छू) कर स्नान के पीछेभी जो स्नान करे वह स्नान नैमित्तिक कहाता है ॥३॥ पुष्य नक्षत्र आदिके समयमें जो ज्योतिष शास्त्र में कहा स्नान है वह काम्य है और निष्काम मनुष्य उस काम्य स्नान को कदापि न करे ॥ ४ ॥ पवित्र मन्त्रों के जपनेके लिये अथवा देवता और पितरों के

२० शङ्खस्मृतिः ॥

स्नानंसमाचरेद्यस्तु क्रियाङ्गंतत्प्रकीर्तितम् ॥ ५ ॥
मलापकर्षणार्थाय स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् ।
मलापकर्षणार्थाय प्रवृत्तिस्तस्यनान्यथा ॥ ६ ॥
सरित्सुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
क्रियास्नानंसमुद्दिष्टं स्नानंतत्रमहाक्रिया ॥ ७ ॥
तत्रकाम्यंतुकर्त्तव्यं यथावद्विधिवोदितम् ।
नित्यंनैमित्तिकंचैव क्रियाङ्गंमलकर्षणम् ॥ ८ ॥
तीर्थाभावेतुकर्त्तव्यमुष्णोदकपरोदकैः ।
स्नानंतुवन्हितप्तेन तथैवपरवारिणा ॥ ९ ॥
शरीरशुद्धिर्विज्ञेया नतुस्नानफलंलभेत् ।
अद्भिर्गात्राणिशुद्ध्यन्ति तीर्थस्नानात्फलंभवेत् ॥ १० ॥
सरःसुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
स्नानमेवक्रियातस्मात्स्नानात्पुण्यफलंसमृतम् ॥११॥


पूजने के अर्थ जो मनुष्य स्नान करे उस स्नान को क्रियांग कहते हैं ॥ ५ ॥
मैल के दूर करने के लिये उबटना वा तैल मर्दन पूर्वक जो स्नान है उसे मलकर्षण स्नान कहते हैं क्योंकि उस स्नान करने में मनुष्य की प्रवृत्ति मैल दूर करने के लिये है अन्यथा नहीं है ॥ ६ ॥ नदी, देवताओं के खोदे कुण्ड, तीर्थ, और छोटी २ नदी, इन में किया स्नान क्रिया स्नान कहाता है क्योंकि इन में स्नान करना उत्तम कर्म है ॥ ७ ॥ उन में पूर्वोक्त नदी आदि में ही काम्य स्नान यथोचित विधि से करना चाहिये । नित्य, नैमित्तिक, क्रियांग, और मलकर्षण ये चार प्रकार के स्नान ॥ ८ ॥ नदी घाट आदि के अभाव में गर्म जल से अथवा नदी आदि से भिन्न किसीप्रकार के जल से भी कर लेवे । अग्नि से तपाये तथा अन्य मनुष्य के निकाले जल से जो स्नान करना है ॥९॥ उस से शरीर की शुद्धि मात्र जानो किन्तु स्नान का विशेष फल वहां नहीं मिलता है । क्योंकि जलों से केवल गात्र शुद्ध होते हैं और तीर्थ स्नान से विशेष फल मिलता है ॥ १० ॥ सरोवर, देवताओं के खोदे तालाब, तीर्थ, नदी, इन में स्नान करना ही उत्तम कर्म है इस कारण स्नान करने से पुण्य फल है ॥११॥

भाषार्थसहिता ॥ २१

तीर्थंप्राप्यानुषङ्गेण स्नानंतीर्थेसमाचरेत् ।
स्नानजंफलमाप्नोति तीर्थयात्राफलंनतु ॥ १२ ॥
सर्वतीर्थानिपुण्यानि पापाघ्नानिसदानृणाम् ।
परस्पराऽनपेक्षाणि कथितानिमनीषिभिः ॥ १३ ॥
सर्वेप्रस्रवणाःपुण्याः सरांसिचशिलोच्चयाः ।
नद्यःपुण्यास्तथासर्वा जाह्नवीतुविशेषतः ॥ १४ ॥
यस्यपादौचहस्तौच मनश्चैवसुसंयतम् ।
विद्यातपश्चकीर्त्तिश्च सतीर्थफलमश्नुते ॥ १५ ॥
नृणांपापकृतांतीर्थे पापस्यशमनंभवेत् ।
यथोक्तफलदंतीर्थं भवेच्छुद्धात्मनांनृणाम् ॥ १६ ॥

इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

क्रियास्नानंतुवक्ष्यामि यथावद्विधिपूर्वकम् ।
मृद्भिरद्भिश्कतर्व्यं शौचमादौयथाविधि ॥ १ ॥
जलेनिमग्नउन्मज्य उपस्पृश्ययथाविधि ।


अकस्मात् अन्य कार्य वश तीर्थ में जाकर जो स्नान करे वह स्नान के फल को तो प्राप्त होगा, पर तीर्थयात्रा का फल उस को नहीं मिलेगा ॥१२॥
सब तीर्थ पवित्र, सदैव मनुष्यों के पापनाशक और परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा न रखने वाले महात्माओं ने कहे हैं ॥ १३ ॥ झरने, सरोवर, पर्वत, नदी, ये सब पुण्यदायक हैं और विशेष कर गंगा जी पवित्र हैं ॥ १४ ॥ जिस के पग, हाथ और मन, ये वशीभूत हैं जो विद्या, तप और कीर्त्ति वाला है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥ १५ ॥ पापी मनुष्यों के पाप की शान्ति (नाश) तीर्थ में हो जाती है । और शुद्ध है मन जिन का ऐसे मनुष्यों को तीर्थ यथोक्त फल का देने वाला होता है ॥ १६ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥

अब क्रियास्नान को यथावत् विधिपूर्वक कहते हैं । प्रथम मट्टी और जल से विधिपूर्वक शरीर की शुद्धि करे ॥ १ ॥ जल में गोता लगा कर और बाहर निकल कर विधिपूर्वक आचमन करके जल का आवाहन करे । उसको

२२ शंखस्मृतिः ॥

जलस्यावाहनंकुर्यात्तत्प्रवक्ष्याम्यतःपरम् ॥ २ ॥
प्रपद्येवरुणंदेवमम्भसांपतिमूर्जितम् ।
याचितंदेहिमेतीर्थं सर्वपापापनुत्तये ॥ ३ ॥
तीर्थमावाहयिष्यामि सर्वाघविनिषूदनम् ।
सान्निध्यमस्मिन्सत्तोये भजत्वंमदनुग्रहात् ॥ ४ ॥
रुद्रान्प्रपद्येवरदान्सर्वानप्सुसदस्तथा ।
सर्वानप्सुसदश्चैव प्रपद्येप्रणतःस्थितः ॥ ५ ॥
देवमप्सुसदंवन्हिं प्रपद्येऽघनिषूदनम् ।
आपःपुण्याःपवित्राश्च प्रपद्येशरणंतथा ॥ ६ ॥
रुद्राश्चाग्निश्चसर्पाश्च वरुणश्चापएवच ।
शमयन्त्वाशुमेपापं मांरक्षन्तुचसर्वशः ॥ ७ ॥
इत्येवमुक्त्वाकर्त्तव्यं ततःसम्मार्जनंजले ।
आपोहिष्ठेतितिसृभिर्यथावदनुपूर्वशः ॥ ८ ॥
हिरण्यवर्णेतिवदेदग्निञ्चतितिसृभिस्तथा ।


पूर्वरूप से कहते हैं कि ॥ २ ॥ बड़े और जलों के पति वरुण देव की मैं शरण होता हूं । हे वरुणदेव ! जिस तीर्थ को मैं चाहूं सम्पूर्ण पापों के दूर करने के अर्थ उसी तीर्थ को आप मुझे दीजिये ॥३॥ सम्पूर्ण पापों के दूर करने वाले तीर्थ का मैं आवाहन करता हूं । हे तीर्थ ! मेरे पर अनुग्रह करके इस उत्तम जल के समीप आइये ॥ ४ ॥ जल में रहते हुए रुद्रों की शरण लेता तथा जल के निवासी अन्य देवताओं को भी मैं नमस्कार करता हुआ शरणागत होता हूं ॥ ५ ॥ जल के भीतर व्यापक पाप के नाश करने वाले अग्नि देवता के भी मैं शरण होता हूं । और पुण्य रूप और पवित्र जलों के भी मैं शरण होता हूं ॥ ६ ॥ रुद्र, अग्नि, सर्प, वरुण, और जल ये सब देवता मेरे पापों का शीघ्र नाश करें और मेरी चारों ओर से रक्षा करें ॥ ७ ॥ ऐसे कह कर फिर जलाशय में घुस कर ( आपोहिष्ठा० ऋ० प्र० ७ अ० ६ । व० ५ ) इत्यादि तीन ऋचाओं के क्रम से यथोक्त ( भली प्रकार ) मार्जन करे ॥ ८ ॥ ( हिरण्यवर्णा० अप्रिरथ० ऋ० ४ । ३ । २५ ) इत्यादि तीन ऋचा (शन्नो देवी०

भाषार्थसहिता ॥ २३

शन्नोदेवीतित्वतथा शन्नआपस्तथैवच ॥ ९ ॥
इदमपःप्रवहत स्तथामन्त्रमुदीरयेत् ।
एवंमन्त्रान्समुच्चार्य छन्दांसिस्तृषिदेवताः ॥ १० ॥
अघमर्षणसूक्तस्य संस्मरेत्प्रयतःसदा ।
छन्दआनुष्टुभन्तस्य ऋषिस्त्वैवाघमर्षणः ॥ ११ ॥
देवताभाववृत्तस्तु पापघ्नस्यप्रकीर्त्तितः ।
ततोम्भसिनिमग्नस्तु त्रिःपठेद्घमर्षणम् ॥ १२ ॥
यथाश्वमेधःक्रतुराट् सर्वपापप्रणाशनः ।
तथाघमर्पणसूक्तं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १३ ॥
अनेनस्नात्वाऽम्मध्ये स्नानवान्धौतवाससा ।
परिवर्त्तितवासास्तु तीर्थतीरमुपस्पृशेत् ॥ १४ ॥
उदकस्याप्रदानाञ्च स्नानशाटीन्नपीडयेत् ।
अनेनविधिनास्नानन्तीर्थस्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि शुभामाचमनक्रियाम् ।


यजु० ३६ । १२ ) - ( शन्न आपः ) इन मन्त्रों को पढ़े ॥९॥ ( इदमपः प्रवहत० ऋ० १ । ६ । ५ ) इस मन्त्र को कहै इसप्रकार मन्त्रों का उच्चारण करके छन्द ऋषि, और देवता जो ॥ १० ॥ अघमर्षण सूक्त के हैं उन को सावधानी से सदैव स्मरण करै । अघमर्षण सूक्त का छन्द अनुष्टुप् , ऋषि अघमर्षण है ॥११॥ पाप के नाशक अघमर्षण सूक्त का भाववृत्त देवता कहा है । फिर जल में गोता लगाये हुए तीन बार अघमर्षण सूक्त को पढ़ै ॥ १२ ॥ जैसे यज्ञों में सब से बड़ा यज्ञ अश्वमेध सब पापों का नाशक है इसी प्रकार अघमर्षण सूक्त सब पापों का नाशक है ॥ १३ ॥ इस विधि से जल में स्नान करके धौत वस्त्र को बदल कर तीर्थ के तीर पर आचमन करै ॥ १४ ॥ और जल दान (तर्पण) किये बिना स्नान की धोती को न निचोड़े जो इस विधि से स्नान करता है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥१५॥

यह शंखस्मृति के भावानुवाद में नवमा अध्याय पूरा हुआ ॥
इस से आगे शोभन आचमन के कर्म को कहते हैं कनिष्ठिका छोटी

२४ शंखस्मृतिः ॥

कायंकनिष्ठिकामूले तीर्थमुक्तंमनीषिभिः ॥ १ ॥
अङ्गुष्ठमूलेचतथा प्राजापत्यंविचक्षणैः ।
अङ्गुल्यग्रेस्मृतं दैवं पित्र्यंतर्जनिमूलके ॥ २ ॥
प्राजापत्येनतीर्थेन त्रिःप्राश्नीयाज्जलं द्विजः ।
द्विःप्रमृज्यमुखंपश्चात्खान्यद्भिःसमुपस्पृशेत् ॥ ३ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
तालुगाभिस्तथावैश्यः शूद्रःस्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ४ ॥
अन्तर्जानुःशुचौदेशे प्राङ्मुखःसुसमाहितः ।
उदङ्मुखोवाप्रयतो दिशश्चानवलोकयन् ॥ ५ ॥
अद्भिःसमुद्धताभिस्तु हीनाभिःफेनबुद्बुदैः ।
वह्निनाचाप्यतप्ताभिरक्षाराभिरुपस्पृशेत् ॥ ६ ॥
तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम् ।
अङ्गुष्ठमध्यायोगेन स्पृशेन्नेत्रद्वयंततः ॥ ७ ॥
अङ्गुष्ठानामिकायोगे श्रवणौसमुपस्पृशेत् ।


अंगुलि के मूल (जड़) में काय तीर्थ महात्मा लोगों ने कहा है ॥ १ ॥ अंगूठे की जड़ में प्राजापत्य तीर्थ और अंगुलियों के अग्रभाग में देव तीर्थ और तर्जनी (अंगूठे के पास की अंगुली) की जड़ में पितृ तीर्थ पण्डितों ने कहा है ॥ २ ॥ प्राजापत्य तीर्थ से तीन बार द्विज पुरुष जल पीवे फिर दो बार मुख को पोंछ कर कान आदि छिद्रों का दहिने हाथ में जल लगा २ के स्पर्श करे ॥ ३ ॥ हृदय तक जाने वाले जलों से ब्राह्मण, कंठ तक जाने वाले जलों से क्षत्रिय, तालू तक जाने वालों से वैश्य और मुख पर स्पर्श किये जलों से शूद्र पवित्र होता है ॥ ४ ॥ गोड़ों के भीतर हाथ किये और सावधानी से पूर्व वा उत्तर दिशा की ओर मुख किये मनको वश में रख के बैठा दिशाओं को न देखता हुआ मनुष्य ॥५॥ कूप से निकाले, झाग बुल बुला जिन में नहीं, जो जल गर्म न किये हों, और खारे भी न हों ऐसे जलों से आचमन करे॥६॥ अंगूठा और तर्जनी को मिला कर (दोनों से) नासिका के दोनों छिद्रों का, बीच की अंगुली और अंगूठे से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे ॥ ७ ॥ अंगूठा और अनामिका के योग से दोनों कानों का, कनिष्ठिका अंगुली और अंगूठे के योग से