अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ३
माङ्गल्यंब्राह्मणस्योक्तं क्षत्रियस्यबलान्वितम् ॥ ३ ॥ वैश्यस्यधनसंयुक्तं शूद्रस्यतुजुगुप्सितम् । शर्म्मान्तंब्राह्मणस्योक्तं वर्म्मान्तंक्षत्रियस्यतु ॥ ४ ॥ धनान्तंचैववैश्यस्य दासान्तंचान्त्यजन्मनः । चतुर्थेमासिकर्त्तव्यं बालस्यादित्यदर्शनम् ॥ ५ ॥ षष्ठेन्नप्राशनंमासि चूडाकार्याथाकुलम् । गर्भाष्टमेऽब्देकर्त्तव्यं ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ ६ ॥ गर्भादेकादशेराज्ञो गर्भात्तुद्वादशेविशः । षोडशाब्दानिविप्रस्य राजन्यस्यद्विविंशतिः ॥ ७ ॥ विंशतिःसचतुष्कातु वैश्यस्यपरिकीर्त्तिता । नातिवर्त्तेतसावित्रीमतऊर्ध्व्वनिवर्त्तते ॥ ८ ॥ विज्ञातव्यास्त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
हो ( जैसा अमितौजाः । अरिन्दमः । इत्यादि ) ॥ ३ ॥ वैश्य का नाम ऐसा हो जिसका अर्थ धन से युक्त हो (जैसा धनसुखराम । लक्ष्मीचन्द्र । इत्यादि) शूद्र का नाम ऐसा हो जिसमें निन्दा प्रतीत हो ( जैसा देवदास कटकक, तुषक इत्यादि ) ब्राह्मण के नाम के पीछे शर्म क्षत्रिय के नाम के पीछे वर्म्म ॥ ४ ॥ वैश्य के नाम के अन्त में धन वा गुप्त शब्द रहे और शूद्र के नाम के अन्त में दास हो । चौथे महीने में बालक को सूर्य का दर्शन करावे इसी का नाम निष्क्रमण संस्कार है ॥ ५ ॥ छठे महीने में अन्न प्राशन संस्कार करावे और मुण्डन संस्कार कुल रीति के अनुसार जन्म से पहिले वा तीसरे वर्ष में [ चाहे जब ] करे । गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत ॥ ६ ॥ गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, गर्भ से बारहवें वर्ष वैश्य का, उपनयन संस्कार करें । ब्राह्मण की सोलह वर्ष तक क्षत्रिय की बाईस वर्ष तक ॥ ७ ॥ और वैश्य की चौबीस वर्ष तक शास्त्र में कही हुई सावित्री गुरु मन्त्र के ग्रहण का नियत काल है । इस से आगे मन्त्राधिकार निवृत्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अपने २ काल के अनुसार नहीं हुआ है संस्कार जिन का ऐसे ये ब्राह्मणादि तीनों वर्ण सावित्री से पतित और सम्पूर्ण धर्मों से