अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ व्यासस्मृतिः ॥
हस्त्यश्वरथयानानिकेचिदिच्छन्तिपण्डिताः । अहंनेच्छामिमुनयः ! कस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५८ ॥ वेदलाङ्गलकृष्टेषु द्विजश्रेष्ठेषुसत्सुच । यत्पुरापातितंबीजं तस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५९ ॥ शतेषुजायतेशूरः सहस्रेषुचपण्डितः । वक्ताशतसहस्रेषु दाताभवतिवानवा ॥ ६० ॥ नरणेविजयाच्छूरोऽध्ययनान्नचपण्डितः । नवक्तावाक्पटुत्वेन नदाताचार्थदानतः ॥ ६१ ॥ इन्द्रियाणांजये शूरो धर्मंचरतिपण्डितः । हितप्रियोक्तिभिर्वक्ता दातासन्मानदानतः ॥ ६२ ॥ यद्येकपङ्क्त्यांत्रिषमन्ददाति स्नेहाद्भयाद्वायदिवार्यहेतोः ।
हाथी, घोड़ा, रथ यान पालकी आदि इन को कोई पण्डित अच्छा कहते हैं परन्तु हे मुनियो ! हम नहीं चाहते क्योंकि ये हाथी आदि किस कर्म की सम्पदा [फल] हैं ? ॥५८॥ वेद रूप हल से जुते जो सत्पात्र ब्राह्मणों के उत्तम शरीर उन में जो पूर्व जन्म में बीज बोया गया था उसी खेती की ये हाथी घोड़ा आदि संपदा [ फल ] हैं ॥५९॥ सौ १०० में एक शूरवीर, हज़ार में एक पण्डित-और लाख में एक वक्ता [जो वेदादि शास्त्र के गूढ़ विषय को ठीक २ वर्णन कर सके ] होता है और लाखों में भी दाता होना दुर्लभ है ॥ ६० ॥ रण में जीत जाने से शूर नहीं होता-वेदादि के पढ़ने मात्र से पण्डित नहीं होता-वाणी की चतुराई मात्र से लिफाफे दार बनावटी व्याख्यान देने वाला वक्ता नहीं होता और धन के देने मात्र से दाता नहीं होता ॥ ६१ ॥ किन्तु इन्द्रियों को जो जीते वह शूर, शास्त्रोक्त धर्म कर्म को जो ठीक २ करै वह पण्डित-वेदानुकूल हित का उपदेश जो प्रिय वाणी से कहे वह वक्ता-और श्रद्धा तथा सन्मान पूर्वक जो दान दे वह दाता होता है ॥ ६२ ॥ स्नेह प्रीति से, भय से, वा धन आदि के लोभ से जो एक पंक्ति में बेठे ब्राह्मणों को विषम न्यूनाधिक परोसता है वा किसी को उत्तम किसी को निकृष्ट भोज्य वस्तु देता है वह ब्रह्म हत्या का दोषी मुनियों ने कहा है यह बात