भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३६ व्यासस्मृतिः ॥

सकल्पंसरहस्यंच तमाचार्यंप्रचक्षते ॥ ४५ ॥ इष्टिभिःपशुबन्धैश्च चातुर्मास्यैस्तथैवच । अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यनेकेष्टंसइष्टवान् ॥ ४६ ॥ मीमांसतेचयोवेदान् षड्भिरङ्गैःसविस्तरैः । इतिहासपुराणानि सम्भवेद्वेदपारगः ॥४७ ॥ ब्राह्मणाथेनजीवन्ति नान्येऽवर्णाःकथञ्चन । ईदृक्पथमवस्थाय कोऽन्यस्तंन्यक्तुमुत्सहेत् ॥ ४८ ॥ ब्राह्मणःसंभवेनैव देवानामतिदैवतम् । प्रत्यक्षंचैवलोकस्य ब्रह्मतेजोहिकारणम् ॥ ४६ ॥ ब्राह्मणस्यमुखंक्षेत्रं निरूपरमखण्डकम् । वापयेत्तत्रबीजानि साकृषिःसार्वकामिकी ॥ ५० ॥ सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेदापयेद्धनम् । सुक्षेत्रेचसुपात्रेच क्षिप्तंनैवविदूष्यति ॥ ५१ ॥


धर्मार्थ पढ़ावे उसे आचार्य कहते हैं ॥ ४५ ॥ दर्शपूर्णमासादि इष्टि, पशुबंध, चातुर्मास्य, और अग्निष्टोम आदि यज्ञों से जिसने देवताओं की पूजा की उसे इष्टवान् नाम यज्ञों का करने वाला कहते हैं ॥ ४६ ॥ अनेक ग्रन्थों में विस्तृत वेद के छः अङ्ग [ व्याकरण आदि ] सहित सारे वेद और इतिहास पुराणों की जो मीमांसा नाम आन्दोलन करे उसे वेदपारग कहते हैं ॥ ४७ ॥ ब्राह्मण लोग जिस वेदोक्त मार्ग से जीविका करते हैं उस से अन्य वर्ण कभी नहीं जीविका करते ऐसे वेदमार्ग में ठहर कर ऐसा अन्य कौन है जो ब्राह्मण का परित्याग करे ॥४८॥ ब्राह्मण उत्पत्तिमात्र से ही देवताओं का भी देवता है और लोगों को ब्राह्मण का प्रभाव प्रत्यक्ष भी है उस का कारण ब्रह्मतेज ही है ॥ ४९ ॥ ऊपर और कांटों से रहित उत्तम खेत ब्राह्मण का मुख है उसी में बीज बोवे क्योंकि वही खेती सब कामना देने वाली है ॥ ५० ॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे क्यों कि अच्छे खेत और सुपात्र में जो अन्न धन छोड़ा जाता है वह कभी भी दूषित वा व्यर्थ नहीं जाता ॥ ५१ ॥