भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१६ व्यासस्मृतिः॥

सुदुष्टांव्यसनासक्तमहितामधिवासयेत् ॥५०॥
अधिविन्नामपिप्रभुः स्त्रीणांतुसमतामियात् ।
विवर्णादीनवदना देहसंस्कारवर्जिता ॥५१॥
पतिव्रतानिराहारा शोष्यतेप्रोषितेपतौ ।
मृतंभर्त्तारमादाय ब्राह्मणीवन्हिमाविशेत् ॥५२॥
जीवन्तीचेत्त्यक्तकेशा तपसाशोधयेद्वपुः ।
सर्वावस्थासुनारीणां नयुक्तंस्यादरक्षणम् ॥५३॥
तदेवानुक्रमात्कार्यं पितृभर्तृसुतादिभिः ।
जाताःसुरक्षितावाये पुत्रपौत्रप्रपौत्रकाः ॥५४॥
येयजन्तिपितॄन्यज्ञैर्मोक्षप्राप्तिमहोदयैः ।

जिस के कोई पुत्र न हो, जिस को असाध्य दीर्घ रोग हो, जो अत्यन्त दुष्ट हो, जिसे कुछ व्यसन (मदिरा पीना आदि) लगा हो और जो पति का हित न चाहती वा करती हो इन ऐसी स्त्रियों का अधिवासन करे अर्थात् इन के विद्यमान होते भी द्वितीय विवाह कर लेवे ॥५०॥ जिस के होते दूसरा विवाह किया है पति को अन्य स्त्रियों के समान ही उस अधिविन्ना स्त्री का आदर वस्त्राभूषणादि से करना चाहिये । पति के परदेश जाने पर जो स्त्री मलिन वर्ण, दीन मुख, देह के संस्कार उबटना तैल मर्दन आदि को न करती हुई ॥५१॥ पति में व्रत रक्खे, अन्य पुरुष का मन में भी ध्यान न करे, अति सूक्ष्म आहार करे, देह को कृश निर्बल कर दे ऐसी ब्राह्मणी आदि पतिव्रता कहाती है, वह मरे हुए पति को लेकर अग्नि में प्रवेश करे (सती होजाय) ॥ ५२ ॥ यदि जीवित रहे तो केशों को मुंडा अपने तप से शरीर को शुद्ध करे स्त्रियों की सब अवस्था (बालक से वृद्ध तक) ओं में पुरुषों को रक्षा करनी उचित है ॥ ५३ ॥ सो बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्रादि लोग अपनी पुत्री, पत्नी और मातादि की क्रम से रक्षा करें। जो सन्तान अपने घर में उत्पन्न हुए वा गोद लेकर जिन का पालन पोषण किया ऐसे जो पुत्र पौत्र और प्रपौत्र कहाने वाले लोग ॥ ५४ ॥ मोक्ष देने वाले तथा महान् फलोदय वाले बड़े २ अग्निहोत्रादि यज्ञों से अपने पितरों को पूजते हैं वे लोग जब मरें तो उन का स्थापित किये अग्निहोत्र के