अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ १५
ऋतुकालेऽभिगम्यैवं ब्रह्मचर्य्यव्यवस्थितः ॥ ४४ ॥
गच्छन्नपियथाकामं नदुष्टःस्यादनन्यकृत् ।
भ्रूणहत्यामवाप्नोति ऋतौभार्य्यापराङ्मुखः ॥ ४५ ॥
सोत्त्वाप्यान्यतोगर्भं त्याज्याभवतिपापिनी ।
महापातकदुष्टाच पतिगर्भविनाशिनी ॥४६॥
सद्वृत्तचारिणींपत्नीं त्यक्त्वापततिधर्मतः ।
महापातकदुष्टोऽपि नाप्रतीक्ष्यस्तयापतिः ॥४७॥
अशुद्धेःक्षयमादूरं स्थितायामनुचिन्तया ।
व्यभिचारेणदुष्टानां पत्नीनांदर्शनादृते ॥४८॥
धिक्कृतायामवाच्यायामन्यत्रवासयेत्पतिः ।
पुनस्तामार्त्तवस्नानां पूर्ववद्व्यवहारयेत् ॥४९॥
धूर्त्तांचधर्मकामघ्नी मपुत्रांदीर्घगेगिणीम् ।
प्रशंसा के योग्य हैं सन्नरा जिस के ऐसे पुत्र को प्राप्त होता है । ऋतु के समय उक्त प्रकार स्त्री का संग करके अन्य समय पुरुष ब्रह्मचारी रहे ॥ ४४ ॥ ऋतु से भिन्न काल में भी यथेच्छ गमन करता हुआ पुरुष दूषित नहीं होता यदि अन्य निन्दित कर्म आदि न करे । जो ऋतुकाल में स्त्री का संग नहीं करता वह भ्रूणहत्या का दोष भागी होता है ॥ ४५ ॥ यदि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से गर्भवती हो जाय तो उस पापिनी का त्याग कर देवे । और पति के गर्भ का नाश करने वाली तथा ब्रह्महत्यादि महापातकों से दूषित हो तो भी उस का त्याग करना चाहिये ॥ ४६ ॥ अच्छे आचरण करने वाली पत्नी को त्याग कर पुरुष धर्म से पतित होता है। और पति महापातक से दूषित हो तो शुद्धि तक वह स्त्री प्रतीक्षा करे (बाट देखे) ॥ ४७ ॥ महापातकी पति की शुद्धि पर्यन्त व्यभिचारी स्त्री दुष्ट पति उन के दर्शन को छोड़ कर थोड़ी दूर स्थान में चिन्ता से ठहरी पत्नी हो तब प्रतीक्षा करे ॥४८॥ और जिसे धिक्कार दी हो वा जिस के संग बोलना छोड़ दिया हो उसे दूसरे स्थान में बसा दे फिर जब वह ऋतु स्नान कर ले तब पूर्व के समान उस के संग बर्ताव करे ॥ ४९ ॥ जो स्त्री धूर्त हो, जो धर्म और काम को नष्ट करे,