अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ व्यासस्मृतिः ॥
एकाम्बरावृतादीना स्नानालङ्कारवर्जिता ।
मौनिन्यधोमुखीचक्षः पाणिपद्भिरञ्चला ॥ ३८ ॥
अश्नीयात्केवलं भक्तं नक्तंमृन्मयभाजने ।
स्वपेद्भुमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ॥ ३९ ॥
स्नायात्तच्चत्रिरात्रान्ते सचैलमुदितेरवौ ।
विलोक्यभर्तुर्वदनं शुद्धाभवतिधर्मतः ॥ ४० ॥
कृतशौचापुनःकर्म पूर्ववच्चसमाचरेत् ।
रजोदर्शनतोयाःस्यु रात्रयःषोडशर्तवः ॥ ४१ ॥
तत्रपुंबीजमक्लिष्टं शुद्धेक्षेत्रेप्ररोहति ।
चतस्रश्चादिमारात्रीः पर्व्ववर्जञ्चविवर्जयेत् ॥ ४२ ॥
गच्छेद्युग्मासुरात्रीषु पौष्णापित्रर्क्षराक्षसान् ।
प्रच्छादिनादित्यपथे पुमान्गच्छेदृतुंव्यापितः ॥ ४३ ॥
क्षमालङ्कृदवाप्नोति पुत्रंपूजितलक्षणम् ।
एकधोती वस्त्र धारण किये दीनदशा रखती हुई; स्नान और आभूषण से वर्जित, मौन हुई; नीचे को मुख किये, हाथ पग इन को विशेष न चलावे ॥३८॥ रात्रि के समय मिट्टी के पात्र में एक वार साम्भी भात खावे । प्रमाद छोड़ सावधान हुई पृथिवी पर चटाई डाल कर सोवे ऐसे तीन दिन वितावे ॥ ३९ ॥ तीन दिन पूरे होने पर चौथे दिन प्रातःकाल सूर्य के उदय हो जाने पर पहिने हुये वस्त्रों सहित स्नान कर फिर शुद्ध वस्त्र पहिन कर अपने पति के मुख को देख के धर्म से शुद्ध होती है ॥४०॥ किया है शौच जिसने वह स्त्री फिर पहिले के समान कामों को करै—रजोदर्शन से लेकर ऋतुकाल की जो सोलह रात्रि होती हैं ॥ ४१ ॥ उन रात्रियों में पुरुषका नीरोग बीज शुद्ध क्षेत्र में जमता है । चार पहिली रात्रियों को और अमावास्या अष्टमी पौर्णमासी चतुर्दशी ये पर्व्व तिथि सोलह में आजावें तो उन को भी छोड़ देवे ॥ ४२ ॥ शेष बची रात्रियों में से ६ । ८ । १० । १२ । १४ । १६ इन समरात्रियों में यदि रेवती-मघा आश्लेषा इन में से कोई नक्षत्र हो तो उस दिन सूर्य के अस्त हो जाने पर रात्रि में पुरुष अपनी स्त्री के पास जावे ॥४३॥ क्षमा से शोभायमान वह पुरुष